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गौरी लंंकेश को श्रद्धांजलि

By Mantralayanews :07-09-2017 08:55


नरेन्द्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम एम कलबुर्गी के बाद अब वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या कर दी गई। बंगलुरू में उन्हें उनके घर पर गोलियों से वैसे ही छलनी किया गया जैसे श्री कलबुर्गी की हत्या की गई थी। इसके पहले नरेन्द्र दाभोलकर व गोविंद पानसरे को उनकी सुबह की सैर के वक्त गोली मार दी गई थी। इन तमाम हत्याओं में केवल मारने का तरीका और हथियार ही एक समान नहींहै, बल्कि कारण भी एक ही नजर आता है- यानी वैचारिक कट्टरता और असहिषणुता।

कर्नाटक में शीघ्र ही चुनाव होने वाले हैं और ऐसे में फासिस्ट शक्तियां सक्रिय हो कर स्वतंत्र विचारों के पैरोकारों को कुचलने की कोशिश कर रही हैं। गौरी लंकेश की हत्या का पहला कारण तो यही नजर आता है। बाकी जिस तरह ऊपर कही गई तीन हत्याओं की जांच चल रही है, वैसे ही इस हत्या की जांच भी आगे बढ़ेंगी। पहले की तीन हत्याओं में जिन संस्थाओं पर जांच की सुई अटकी है, उन पर अब तक तो कोई कार्रवाई नहींहुई है और उनके लोग पहले से अधिक उच्छृंखल होकर अपना एजेंडा पूरा करने में लगे हैं। ऐसे में गौरी लंकेश को कब न्याय मिलेगा, कहा नहींजा सकता। फिलहाल गौरी लंकेश की हत्या से भारत का पत्रकार जगत स्तब्ध है और संवेदनशील समाज हतप्रभ कि आखिर हमारा लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आजादी, किस दिशा में आगे बढ़ रही है। भारत में एक पूर्णकालिक पत्रकार की इस तरह से सरेआम हत्या एक अभूतपूर्व घटना है।

55 वर्षीय गौरी दक्षिणपंथी विचारों की मुखर विरोधी थीं। ताउम्र वे कट्टरता के विरोध में खुलकर लिखती और बोलती रहींं। बंगलुरु में वे अपने पिता पी. लंकेश द्वारा प्रारंभ की गई लंकेश पत्रिका का संचालन कर रही थीं। इस पत्रिका के ज़रिए उन्होंने कम्युनल हार्मनी फोरम को काफी बढ़ावा दिया। हाल ही में उन्होंने राणा अय्यूब की किताब गुजरात फाइल्स का भी कन्नड़ में अनुवाद किया था। सुश्री अय्यूब का कहना है कि पिछले कुछ समय से उन्हें लगातार कुछ दक्षिणपंथी संगठनों से धमकियां मिल रही थीं। कुछ समय पहले ही भाजपा के एक नेता ने उन पर मानहानि का दावा किया था। गौरी लंकेश को निजी तौर पर और एक पत्रकार के रूप में जानने वालों का यही मानना है कि उनकी हत्या विचारधारा के कारण ही हुई है। वे यह बताने से कभी पीछे नहींहटती थींकि वे एक धर्मनिरपेक्ष देश की नागरिकहैं और किसी भी तरह की धार्मिक कट्टरता के खिलाफहैं। उनकी यह बेलाग स्वीकारोक्ति ही शायद उनकी मौत की वजह बनी। 

गौरी लंकेश ने अपना पूरा जीवन पत्रकारिता को समर्पित किया था। अपनी मौत से पहले भी उन्होंने गोरखपुर में बच्चों की मौत तथा भारत में रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थियों के बारे में लेख लिखे थे। वे सोशल मीडिया पर सक्रिय थींऔर मृत्यु से कुछ घंटों पहले के उनके दो ट्वीट इस वक्त पत्रकार बिरादरी में चर्चा का विषय बने हैं। उन्होंने लिखा था कि हम लोग कुछ फर्जी पोस्ट शेयर करने की गलती करते हैं। आइए एक-दूसरे को चेताएं और एक-दूसरे को एक्सपोज करने की कोशिश न करें।

 
इसके अगले ट्वीट में उन्होंने लिखा कि मुझे ऐसा क्यों लगता है कि हममें से कुछ लोग अपने आपसे ही लड़ाई लड़ रहे हैं। हम अपने सबसे बड़े दुश्मन को जानते हैं। क्या हम सब प्लीज इस पर ध्यान लगा सकते हैं। पत्रकारिता से जुड़े लोगों के लिए यह बड़ा संदेश है, क्योंकि इस वक्त मीडिया में कुछ लोग अपने निज स्वार्थों के कारण वृहत्तर उद्देश्यों से भटक रहे हैं। गौरी लंकेश की हत्या पूंजी और सत्ता के हाथों कठपुतली बनते जा रहे पत्रकारों के लिए चेतावनी भी है। एक वरिष्ठ पत्रकार की इस निर्मम हत्या पर देशबन्धु अपना विरोध प्रकट करता है और उन्हें श्रद्धांजलि देता है इस उम्मीद के साथ कि इस देश में अभिव्यक्ति के खतरे उठाने वाले लोग पहले से अधिक निडर और निष्पक्ष होकर अपना दायित्व निभाएंगे।
 

Source:Agency