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'108' में संक्रमण का खतरा, स्वाइन फ्लू मरीज को ले जाने के बाद सफाई नही

By Mantralayanews :08-09-2017 10:09


भोपाल। स्वाइन फ्लू से लगातार मौतें हो रही हैं, इसके बावजूद हर स्तर पर लापरवाही बरती जा रही है। 108 एंबुलेंस से स्वाइन फ्लू मरीजों को ले जाने के बाद एंबुलेंस की सफाई तक नहीं की जा रही है। उसी एंबुलेंस से गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को भी ले जाया जा रहा है। इस वजह से उन्हें संक्रमण का खतरा है।

जेपी अस्पताल से 2 सितंबर को स्वाइन फ्लू की एक संदिग्ध मरीज को 108 एंबुलेंस से हमीदिया ले जाया गया। उसके बाद एंबुलेंस में संक्रमण रहित करने के लिए कोई उपाय नहीं किए गए। इसी तरह पूरे प्रदेश में स्वाइन फ्लू के संदिग्ध और पॉजिटिव मरीजों को 108 एंबुलेंस से अस्पतालों में शिफ्ट किया जा रहा है।

उसी वाहन से अन्य मरीजों को अस्पताल पहुंचाया जाता है। इसके पहले एंबुलेंस को संक्रमण मुक्त नहीं किया जाता है। इंफेक्शन कंट्रोल की गाइडलाइन के अनुसार हर छह महीने में कम से एक बार एंबुलेंस को संक्रमण मुक्त (फ्यूमिगेशन) किया जाना चाहिए। इस संबंध में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अफसरों ने कहा कि एंबुलेंस स्टाफ की ड्यूटी है कि वह वाहन की सफाई रखे। उधर, कर्मचारियों ने कहा कि सफाई के लिए पानी तक नहीं मिलता। ऐसे में हम क्या कर सकते हैं।

स्वाइन फ्लू से दो महिलाओं की मौत, अब तक 19 मौतें

राजधानी में गुरुवार सुबह स्वाइन फ्लू से दो महिलाओं की मौत हो गई है। इनमें से एक सागर व दूसरी होशंगाबाद की रहने वाली थी। दोनों का इलाज अलग-अगल निजी अस्पताल में चल रहा था। स्वास्थ्य विभाग के अफसरों ने बताया कि दोनों महिलाओं को डायबिटीज, सांस की बीमारी व अन्य समस्याएं थीं, इस वजह से स्वाइन फ्लू का संक्रमण खतरनाक स्थिति में पहुंच गया। एक जुलाई से अब तक भोपाल में स्वाइन फ्लू से 19 मरीजों की मौत हो चुकी है।

हमीदिया अस्पताल में स्वाइन फ्लू के नोडल ऑफीसर डॉ. निशांत श्रीवास्तव ने बताया कि डायबिटीज के मरीजों की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। लिहाजा, उन्हें विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को भी स्वाइन फ्लू को लेकर विशेष तौर पर सावधान रहना चाहिए।

इसलिए बिगड़ रही मरीजों की हालत

- हाईरिस्क मरीजों को स्वाइन फ्लू की दवा फौरन दी जानी चाहिए। हमीदिया अस्पताल के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. लोकेन्द्र दवे ने बताया कि कुछ मरीज कई अस्पतालों में भटकने के बाद हमीदिया पहुंचते हैं। उसके बाद स्वाइन फ्लू की दवा शुरू की जाती है। मरीज हाईरिस्क में है तो ए कैटेगरी में होने पर भी दवा शुरू कर देना चाहिए।

- मरीजों की जांच रिपोर्ट आने में दो से तीन दिन लग रहे हैं। तब तक उन्हें संदिग्ध की श्रेणी में रखकर इलाज किया जाता है। मरीज की मॉनीटरिंग गंभीरता से नहीं की जाती।

दूसरे मरीजों और स्टाफ को संक्रमण का खतरा

गाड़ियों के आने के बाद फ्यूमिगेट नहीं किया गया है, जबकि हेपेटाइटिस, एचआईवी के मरीजों ब्लीडिंग हालत में अस्पताल पहुंचाया गया है। अब स्वाइन फ्लू के मामले में इसी तरह की लापरवाही हो रही है। इससे दूसरे मरीजों और स्टाफ को संक्रमण का खतरा है। -नृपेन्द्र मिश्रा, महामंत्री, 108 एंबुलेंस कर्मचारी संघ

Source:Agency