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परोपकार का भी प्रतीक है लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा

By Mantralayanews :05-10-2017 08:11


लखनऊ में भूलभुलैया नाम से भी मशहूर बड़े इमामबाड़े का निर्माण नवाब आसिफ उद्दौला ने करवाया था। लखनऊ के इस प्रसिद्ध इमामबाड़े का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। ये इमामबाड़ा एक नवाब के परोपकारी कदम का प्रतीक है जो अपनी प्रजा के हित को ध्‍यान में रख कर उठाया गया था। साल 1784 में नवाब ने अकाल राहत परियोजना के अन्तर्गत इसे बनवाया था। इसके चलते ही ये कहावत बनी कि जिसे न दे मौला, यानि भगवान, उसे दे आसफुउद्दौला। कहते हैं ये उस दौर की ऐसी अंतिम इमारत है जिसमें यूरोपियन शैली और लोहे का प्रयोग नहीं हुआ है। 

ऐसी है ये इमारत

इमामबाड़े की इमारत एक विशाल गुम्बदनुमा हॉल की तरह है, जो 50 मीटर लंबा और 15 मीटर ऊंचा है। एक अनुमान के अनुसार इसे बनाने में उस दौर में पांच से दस लाख रुपए का खर्च हुआ था। कहा तो ये भी जाता है कि इस इमारत के पूरा होने के बाद भी नवाब इसकी साज सज्जा पर चार से पांच लाख रुपए सालाना खर्च करते थे। इमामबाड़े के परिसर में एक अस़फी मस्जिद भी है, जहां मुस्लिम समाज के लोग ही जा सकते हैं। मस्जिद के आंगन में दो ऊंची मीनारें हैं।  यहीं पर विश्व-प्रसिद्ध भूलभुलैया बनी है, जिसमें अनचाहे प्रवेश करने वाले अनजान लोग रास्ता भूल जाते हैं। इसीलिए अब यहां की सैर करने वाले केवल गाइड के साथ  ही इसके अंदर जाते हैं। 

इमामबाड़े से जुड़ी कहानियां

इस इमामबाड़े से कई कहानिया भी जुड़ी हुई हैं। कहते हैं कि इस इमामबाड़े के अंदर अंडरग्राउंड कई रास्‍ते हैं। इनमें से एक गोमती नदी के तट पर खुलता है तो एक फैजाबाद तक जाता है। वहीं कुछ रास्‍ते इलाहाबाद और दिल्‍ली तक भी पहुंचते थे। ये भी कहा गया कि ये रास्‍ते वाकई अब भी मौजूद है पर दुर्घटनाओं के डर से उन्‍हें सील कर दिया गया है ताकि कोई उनके भीतर ना जा सके। 

कैसे जायें: लखनऊ शहर उत्‍तर प्रदेश की राजधानी है, इसलिए पूरे देश से ये वायु और रेलमार्ग से जुड़ी हुई है। यहां पर ही अमौसी हवाई अड्डा है जिसे अब चौधरी चरणसिंह अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा कहा जाता है। यहां से देश के हर बड़े शहर की उड़ाने आती जाती हैं। साथ ही चारबाग स्‍टेशन है जो पूरे देश से जुड़ा है। इन दोनों जगह से आपको पब्‍लिक ट्रांसर्पोट की सुविधा मिल जाती है जिससे आप इमामबाड़े तक जा सकते हैं। 
 

Source:Agency