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55 साल से रोजाना प्रभातफेरी निकाल रहा है ये गांव

By Mantralayanews :09-11-2017 08:25


दिनेश धीवर/मुंडा। जिला मुख्यालय से महज 14 किमी दूर मुख्यमार्ग में बसे ग्राम मुंडा में पचपन साल से रोजाना प्रभातफेरी निकाली जा रही है। गांव के कुछ बुजुर्ग और कुछ युवा साथी मिलकर सुबह-सुबह प्रभातफेरी निकालकर गांव का वातावरण भक्तिमय बनाते हैं, जिससे बहुत लोगों के दिन की शुरुआत बेहतर ढंग से होती है।

गांव में कुछ बुजुर्ग युवाओं को साथ में लेकर सुबह चार बजे से ही प्रभातफेरी के लिए ढोल, मृदंग लेकर निकल जाते हैं और पूरी बस्ती का एक चक्कर लगाते हैं। यह भ्रमण अंततः प्रतिदिन गांव के बरम बावा चौक में जाकर पूजा-अर्चना कर समाप्त होती है।

साल के बारहों महीने, प्रत्येक मौसम में पिछले पचपन साल से इस अखंड परंपरा का निर्वाह बिना किसी मदद के बदस्तूर जारी है। इस गांव की कुल आबादी लगभग 2500 के आसपास है।

आधुनिक जीवन शैली के कारण, आज के समय में जब आदमी की दिनचर्या बुरी तरह अनियमित हो गई है। देर रात तक जागना और दिन निकलने तक सोना ही जीवन शैली का हिस्सा हो गया है। ऐसे परिवेश में सुबह चार बजे से उठकर ढोल, मंजीरा और मृदंग लेकर कोई टोली हरिनाम संकीर्तन करते दिख जाए तो इससे ज्यादा सुखद आश्चर्यजनक कोई बात नहीं हो सकती।

पचपन साल पहले प्रारंभ हुआ था सिलसिला

गांव के ही बुजुर्ग टिकेश्वर पांडेय और बुधराम रजक बताते हैं कि, आज से लगभग 55 वर्ष पूर्व गांव में कहीं से एक महात्मा का आगमन हुआ था, और उसी समय से उनकी प्रेरणा से कुछ युवाओं ने प्रभातफेरी निकालना प्रारंभ किया था। वह सिलसिला आज भी बिना किसी अड़चन के जारी है।

प्रारंभ में स्व. फूलसिंह वर्मा बढ़ई, स्व. टीकाराम विश्वकर्मा, स्व. भोजराम वर्मा, स्व. पुसऊ फेकर, स्व. हरिराम रजक, कृपाल सेन, स्व. शाखाराम रजक, जयंत वर्मा और बुधराम रजक ने मिलकर इसे प्रारंभ किया था।

बुधराम रजक आज 67 साल के हो चुके हैं और आज भी इस टोली का नेतृत्व कर रहे हैं। वर्तमान में बुधराम रजक, रामकुमार वर्मा, दिलीप वर्मा, कोमल वर्मा, दशरथ वर्मा, हुलकर वर्मा, सिद्घेश्वर वर्मा, पुनीराम पटेल, मिलकर प्रभात फेरी निकालते हैं।

घरों से मिले अन्नादान से चलता है काम

प्रभातफेरी दल जिन घरों में जाते थे उन घरों की संख्या आज 25 तक सिमट गई है। किसी जमाने में लगभग 300 घरों में प्रभातफेरी करने वाले लोग भगवान की फोटो और ढोल मृदंग के साथ जाते थे।

उन घरों में महिलाएं रोज सुबह भगवान की आरती उतारा करती थीं और बदले में थोड़ा अन्ना दान किया करते थे। जिससे इनके ढोल मजीरे-मृदंग की मरम्मत का खर्च निकल आता था। आज जिन घरों में रोज उन घरों में आरती उतारी जाती है, चावल दिया जाता है वे गिनती के 25 घर ही रह गए हैं।

बचाने की जरूरत है इस परंपरा को

गांव के ही पुराने गौटिया टिकेश्वर पांडेय बताते हैं कि, जिस तेजी से लोगों का मन इन बातों की ओर से हटता जा रहा है, और प्रभातफेरी में आरती करने वालों की संख्या जिस तरह से कम हो रही है, यह बात चिंताजनक है। युवा वर्ग को आगे आकर गांव की इस गौरवशाली परंपरा के रक्षण का दायित्व लेना चाहिए।
 

Source:Agency