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हर सांस के साथ फेफड़ों में घुलता जहर, जिम्मेदार हम स्वयं

By Mantralayanews :13-11-2017 07:39


प्रकृति से खिलवाड़ करने का नतीजा दिल्ली से वाराणसी तक देश की हवा में घुल कर आसमान पर कालिख के रूप में छा गया है। नेशनल अकेडमी ऑफ साइंसेज में हाल ही में प्रकाशित शोध में वैज्ञानिकों ने इसके लिए बढ़ती आबादी और अमीर लोगों द्वारा अपने भौतिक आराम के लिए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को जिम्मेदार ठहराया है, जिसके चलते पर्यावरण प्रदूषण इस स्तर पर पहुंच चुका है कि जलवायु परिवर्तन के चलते धरती के तमाम वन्यजीवों का विनाश 'महामारी'  का रूप ले चुका है। पिछले कई दिनों से देश की राजधानी दिल्ली प्रदूषण से बेहाल है। सरकार, अदालतें बेबस हैं। इस बीच हवा मेंं प्रदूषण के स्तर को लेकर आई एक रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया कि दिल्ली एनसीआर से ज्यादा प्रदूषण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी में है। 

क्या हमने कभी सोचा है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसी उन्नत सभ्यताएं, इस तरह कैसे खत्म हो गईं कि उस दौर के सारे शहर, घर, यहां तक कि मिट्टी के बर्तन तक बच गए, सिवाय इन्सानी प्रजाति के।  लगभग साढ़े 4 अरब वर्ष पुरानी अपनी धरती पर अब से पहले 5 बार ऐसा हो चुका है जब सबसे ज्यादा सक्षम, ताकतवर और धरती के इस कोने से उस कोने तक फैली प्रजातियां 'महाविनाश' की भेंट चढ़ पूरी तरह खत्म हो गईं। पांचवीं घटना ने विशालकाय डायनासोर का नामोनिशान तक मिटा दिया था। पहले आए ये पांचों 'महाविनाश'  प्राकृतिक वजहों से आए थे, पर इस बार खतरा इन्सानों की तरफ से है। हमने कुछ समय पहले ही अपने स्तंभ में लिखा था कि पृथ्वी छठें 'महाविनाश' की तरफ  तेजी से बढ़ रही है।

यह खतरा आधुनिक सुख, सुविधा और समृद्धि की हमारी ललक के चलते आया है। विकास और आधुनिकता के नाम पर हम अपनी बर्बादी की दास्तान खुद लिख रहे हैं। अनगिनत गाड़ियां, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, पर्वत और पर्यावरण ही नहीं धरती और समुद्र से खनिज, तेल आदि के लालच में अंधाधुंध खुदाई, लंबी चौड़ी सड़कें और बड़ी-बड़ी ऊंची इमारतें, हमारे विकास नहीं, विनाश की कहानी लिख रही हैं। अमेरिकी और मैक्सिकन वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर अगले 20 सालों के अंदर जैव विविधता पर हो रहे शक्तिशाली 'हमले' को रोका नहीं गया तो कई वन्य प्रजातियों के सामूहिक तौर पर विलुप्त होने के खतरे के साथ ही मानव सभ्यता के भी नष्ट हो जाने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

प्रकृति से खिलवाड़ करने का नतीजा दिल्ली से वाराणसी तक देश की हवा में घुल कर आसमान पर कालिख के रूप में छा गया है। नेशनल अकेडमी ऑफ सांइसेज में हाल ही में प्रकाशित शोध में वैज्ञानिकों ने इसके लिए बढ़ती आबादी और अमीर लोगों द्वारा अपने भौतिक आराम के लिए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को जिम्मेदार ठहराया है, जिसके चलते पर्यावरण प्रदूषण इस स्तर पर पहुंच चुका है कि जलवायु परिवर्तन के चलते धरती के तमाम वन्यजीवों का विनाश 'महामारी' का रूप ले चुका है। पिछले कई दिनों से देश की राजधानी दिल्ली प्रदूषण से बेहाल है। सरकार, अदालतें बेबस हैं। इस बीच हवा में प्रदूषण के स्तर को लेकर आई एक रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया कि दिल्ली एनसीआर से ज्यादा प्रदूषण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी में है। 

सेन्ट्रल पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने 10 नवंबर को देश के 42 शहरों के प्रदूषण का जो आंकड़ा जारी किया, उसमें हवा का सबसे जहरीला स्तर वाराणसी का था। एयर क्वालिटी इंडेक्स के मुताबिक, काशी देश का सबसे प्रदूषित शहर है।  वाराणसी में विकास के नाम पर निर्माण की भरमार है, जो हमें बर्बादी की तरफ ले जा रही। स्टैंफोर्ड और मैक्सिको सिटी युनिवर्सिटी के वैज्ञनिकों ने अपने शोध में खुलासा किया है कि इन्सान बढ़ती आबादी के चलते अपनी जरूरतें पूरा करने के लिए जानवरों की रिहाइश वाले इलाकों यानी जंगल में दखल दे रहा है। जंगलों को काट रहा है, हवा में जहर घोल रहा है और आवश्यकता से अधिक पानी की बर्बादी कर पर्यावरण के संतुलन को बिगाड़ रहा है। जिसकी वजह से पिछले 100 सालों में धरती से वन्यजीवों की 200 प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं, जबकि पिछले 20 लाख सालों में औसतन हर 100 साल में केवल 2 ही प्रजातियां विलुप्त हुई थीं। 

 
धरती के पर्यावरण पर इन्सानी दखल से आये इस बदलाव से चिड़िया से लेकर जिर्राफ तक प्रभावित हैं। आलम यह है कि धरती की आबोहवा में सांस लेने वाला कोई भी जीव इससे अछूता नहीं है। वन्यजीवों के प्रभावित होने का आलम यह है कि धरती के रीढ़धारी जीव-जंतु, स्तनधारी, पक्षी, रेंगनेवाले और उभयचर की प्रजातियों का 30 प्रतिशत हिस्सा विलुप्त हो चुका है। यही नहीं, दुनिया के अधिकांश हिस्सों में स्तनधारी जानवर अपना भौगोलिक क्षेत्र छिनने की वजह से अपनी जनसंख्या का 70 प्रतिशत हिस्सा खो चुके हैं।  उदाहरण के तौर पर चीते की संख्या घटकर सिर्फ 7 हजार रह गई है। यहां तक कि अफ्रीकी शेरों की संख्या में साल 1993 से अब तक 43 फीसदी की गिरावट आई है। इन वैज्ञानिकों का दावा है कि धरती पर इन्सान के उद्भव के साथ कभी पचास फीसदी हिस्सा शेयर करने वाली वन्यप्रजातियां पहले ही विलुप्त हो चुकी हैं, ऐसे में यह खतरा और भी बड़ा है। 

अमेरिकी वैज्ञानिकों की इस चेतावनी का पर्यावरणविद ठीक से अध्ययन भी नहीं कर पाये थे कि अंटार्कटिका के चौथे सबसे बड़े आईसबर्ग 'लार्सेन सी'  के एक बहुत बड़े हिस्से के अलग होने की खबर आ गई। इस आईसवर्ग का वजन खरबों टन और आकार 5 हजार 80 वर्ग किलोमीटर यानी भारत की राजधानी दिल्ली के आकार से 4 गुना, गोवा के आकार से डेढ़ गुना और अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर से 7 गुना बड़ा है। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के मुताबिक यह हिमखंड इसी 10 और 12 जुलाई के बीच टूटकर अलग हुआ है। लार्सेन ए और बी पहले ही ढह चुके हैं। वैज्ञानिकों ने इस हिमखंड के अलग होने के पीछे कार्बन उत्सर्जन को सबसे बड़ी वजह बताया है। उनके मुताबिक कार्बन उत्सर्जन से वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी हो रही है, जिससे ग्लेशियर तेजी से पिघलते जा रहे हैं। अब 'लार्सेन सी' के अलग हो जाने से वैश्विक समुद्री स्तर में 10 सेंटीमीटर तक की वृद्धि हो सकती है। भारत का 7,500 किलोमीटर लंबा समुद्रतटीय इलाका भी इससे खतरे में है। समुद्री स्तर में बढ़ोतरी होने से अंडमान और निकोबार के कई टापू और बंगाल की खाड़ी में सुंदरवन के हिस्से डूब सकते हैं। हालांकि, अरब सागर की तरफ  इसका असर कम होगा लेकिन इसका असली असर लंबे समय में दिखेगा। 

तय है कि अगर हम किसी विश्वयुद्ध में नहीं मारे गये तो छठे महाविनाश की भेंट चढ़ेंगे, जिसकी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।  हमारे पास इससे बचने के मौके बेहद कम हैं। हमारे पास शायद दो या तीन दशक भी नहीं बचे हैं। यह कम अचरज की बात नहीं कि अमेरिकी और मैक्सिकन वैज्ञानिकों ने जिन खतरों का अभी जिक्र किया है उस पर हमारे पौराणिक ग्रंथों से लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तक ने खूब बल दिया था। गांधी के ग्राम स्वराज पर अगर ध्यान दिया गया होता तो हम विकास और शहरीकरण की अंधी दौड़ में नहीं भागते, पेड़ों की इतनी कटाई न होती। वैज्ञानिकों का जोर है कि हमें अपनी  सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरण से जुड़ी इन्सानी जरूरतें घटानी होंगी, प्रकृति का दोहन रोकना होगा और जब आबादी कम होगी, तो पर्यावरण के दोहन की गति भी अपने आप कम होती जाएगी। 

आसमान में छाया जहरीले धुएं से भरा कुहासा केवल आने वाले विनाश का एक संकेत भर है। अगर हम समझ जाएं तो ठीक, वरना हर आती-जाती सांस के साथ इन्सान तिल-तिल कर मर ही रहा।  मौत की यह रफ्तार धीमी हो और हमारी आने वाली पीढ़ियां इस खूबसूरत धरती और इन्सान द्वारा अब तक हासिल की गई तरक्की को देख पाएं, इसके लिए हम अपने स्तर से गंभीर प्रयास करें। आमीन!
(लेखक ड्रीम प्रेस कंसल्टेंट्स लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।)
 

Source:Agency