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विदेशों में जमा कालाधन वापस लाने के दावे कितने सफल

By Mantralayanews :14-11-2017 07:04


विदेशों में जमा कालेधन पर बहुत बोलने वाले कुछ तत्वों की एक कमी यह है कि अपने देश में जमा  कालेधन के बारे में नहीं बोलते हैं, जबकि यह विदेशों से वापस प्राप्त हो सकने वाले कालेधन से भी अधिक है। सच तो यह है कि विदेशों में कालेधन के बारे में बहुत बोलने वाले कुछ तत्व तो स्वयं काले  धन के कारोबार में लगे हैं, या ऐसे कारोबारियों से नजदीकी संबंध रखते हंै। इस तरह पूरा ध्यान विदेशी धन में केंद्रित करने का उनका एक मकसद यह भी है कि अपने देश में जमा कालेधन की ओर लोगों का ध्यान न जाए। सही रणनीति यह होगी कि देशी और विदेशी काले धन पर एक साथ चोट की जाए व उस व्यवस्था को हटाने के प्रयास किए जाए जिसके कारण विभिन्न स्तरों पर काले धन का कारोबार इतनी तेजी पर है।

अनेक निर्धन व विकासशील देशों में हाल के वर्षों में इस मुद्दे ने जोर पकड़ा है कि इन देशों के अरबपतियों ने जो पैसा विदेशों में स्थित टैक्स हेवन में जमा करवाया हुआ है उस धन को वापस लाकर जन-हित के कार्यों में इनका उपयोग किया जाए। इतना ही नहीं, कुछ धनी देशों के ईमानदार नेताओं ने भी इस विषय में रुचि दिखाई है क्योंकि वे भी चाहते हैं कि उनके देशों में जन-हित कार्यों के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध हों व अरबपतियों के दबदबे पर कुछ नियंत्रण लगे।

इस विषय के महत्व व इसकी बढ़ती समझ के बावजूद कई देशों में धन वापस लाने के वायदे अधिक आगे नहीं बढ़ पाए हैं। भारत में भी पिछले आम चुनावों से पहले इस बारे में जो बड़े-बड़े वायदे किए गए पर उन्हें पूरा नहीं किया गया।

विश्व के अनेक नेताओं की कथनी और करनी में जो बड़ा अन्तर पाया गया है इसके कारण टैक्स हेवन के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई के प्रयास अभी सफल नहीं हो सके हैं। टैक्स हेवन का अर्थ है चोरी से छिपाए गए टैक्स व अन्य अवैध धन को ठिकाने लगाने के ऐसे सफेदपोश अड्डे जहां दुनिया की तमाम काली करतूतों को सम्मानजनक आवरण पहनाया जाता है। दुनिया में जगह-जगह बने टैक्स हेवन में इस धन को न केवल छिपा कर रखा जाता है, बल्कि इसे टैक्स मुक्त भी रखा जाता है या इस पर बहुत कम टैक्स लगाया जाता है। जो व्यक्ति या कंपनियां बड़े पैमाने पर टैक्स चुराते हैं, बड़े पैमाने का भ्रष्टाचार करते हैं या अन्य आर्थिक अपराध करते हैं, वे इन टैक्स हेवन में बैंकों को मोटी फीस देकर अपना धन सुरक्षित रख सकते हैं। यह बैंक गोपनीयता व अपारदर्शिता के लिए कुख्यात हैं। वहां किसका कितना धन जमा है, किसका कितना स्वामित्व है, ऑडिट रिपोर्ट क्या कहती है, अपराधी व भ्रष्टाचारी तत्वों के धन को रखने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं, सामान्य स्थिति में इसके बारे में जानकारी नहीं के बराबर उपलब्ध होती है। सच कहा जाए तो विश्व के सबसे धनी व्यक्तियों, बड़ी व बहुराष्ट्रीय कंपनियों व सत्ताधारियों की आय व संपत्ति में प्राय: वैध-अवैध, खुले-गोपनीयता का मिश्रण रहता है।

अत: इन सभी के लिए ऐसे गोपनीय व अपारदर्शी टैक्स हेवन बहुत उपयोगी हैं। यही वजह है कि यह टैक्स हेवन काफी समय से चले आ रहे हैं। इस रूप में स्विट्जरलैंड के बैंक तो बहुत पहले ही 'प्रतिष्ठित' हो चुके थे, व बाद में लुक्समबोर्ग सिंगापुर आदि अन्य देशों को भी यह ख्याति मिली। धनी देशों ने कुछ पूर्व उपनिवेश रहे छोटे टापूनुमा देशों को टैक्स हेवन बनने के लिए तैयार किया व बाद में उनपर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष नियंत्रण बनाए रखा। ऐसे कई छोटे-छोटे देश हैं जो टैक्स हेवन के रूप में ब्रिटेन जैसे शक्तिशाली देश या लंदन जैसे बड़े वित्तीय बाजार से जुड़े हैं।

1980 के बाद वित्तीय कारोबार से नियंत्रण हटाने और उसे खुली छूट देने का जो दौर आरंभ हुआ, उसके बाद तो टैक्स हेवनों की संख्या तेजी से बढ़ी व तब से अब तक इनमें लगभग तीन गुना की वृद्धि हो चुकी है। इन टैक्स हेवनों के गोपनीय खातों में अनेक देशों के बड़े भ्रष्टाचारी व टैक्स चोरी करने वाले व अन्य अपराधी अपना अवैध धन जमा करवाते रहे हैं। अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां इन टैक्स हेवनों में अपनी उपस्थिति का उपयोग इस तरह करती हंै कि अन्य देशों में भी वे अपनी टैक्स की जिम्मेदारी को कम कर सकें। बड़े पैमाने पर व्यापार को कृत्रिम रूप से टैक्स हेवनों के माध्यम से होता हुआ दिखाया जाता है ताकि टैक्स की चोरी की जा सके। इस तरह विभिन्न गरीब व विकासशील देशों की सरकारें भी बड़ी व बहुराष्ट्रीय कंपनियों से प्राप्त होने वाले टैक्स से वंचित हो जाते हैं व उनका बजट घाटे में चला जाता है। ऐसी नाजुक स्थिति में उन्हें निजीकरण की ओर धकेला जाता है।

करोड़ों डालर की फीस लेकर बैंकर, एकाऊंटेंट व वकील ऐसे जुगाड़ करते हैं कि वे अति धनी व्यक्तियों व कंपनियों का अरबों डालर का टैक्स बचा सकें, व इस प्रयास में टैक्स हेवन उनके लिए बहुत उपयोगी होते हैं। मौजूदा आर्थिक संकट को उत्पन्न करने वाले बैंकरों व सट्टेबाजों ने जिस प्रकार तरह-तरह की संदिग्ध मूल्य व अधिक जोखिम की वित्तीय परिसंपत्तियों का कारोबार फैलाया, उसमें उन्हें टैक्स हेवन के गोपनीय और अपारदर्शी व्यवस्थाओं से बहुत सहायता मिली।

 
इस तरह ऐसी स्थितियां बन गई हैं कि कई लोकतांत्रिक सरकारों के लिए ईमानदारी का टैक्स ढांचा स्थापित करने में व विकास के लिए जरूरी आर्थिक संसाधन जुटाने में ही बहुत कठिनाई होने लगी है। अनेक व्यवसायी भी इससे परेशान हैं क्योंकि टैक्स हेवन का अनुचित लाभ उठाने वाली कंपनियां मुनाफे व प्रतिस्पर्धा में उनसे आगे निकल जाती हंै। साथ में यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि अब तक इस दिशा में कौन से प्रयास सफल रहे हैं, व कितने सफल रहे हैं। इस संदर्भ में एक बड़ा अभियान नाईजीरिया के तानाशाह सनी अबाचा द्वारा विदेश में जमा किए गए कालेधन को लेकर चला था। सनी अबाचा 1990 के दशक के अंतिम दौर में नाईजीरिया का प्रमुख सत्ताधारी था। उसके शासन काल के बारे में प्रतिष्ठित इकनॉमिस्ट पत्रिका ने लिखा था कि नाइजीरिया के केंद्रीय बैंक को प्रतिदिन 150 लाख डालर इस तानाशाह के स्विस बैंक खाते में (या अन्य गुप्त विदेशी खातों में) ट्रांसफर करने का स्थायी आदेश मिला हुआ था। अबाचा को सत्ता से हटाए जाने के बाद इस लूट को नाईजीरिया में लौटाने के लिए अभियान चला जिसने विश्व स्तर पर दबाव सफलता से बनाया। अंत में काफी बड़ी धनराशि नाईजीरिया को लौटाई गई, पर यह पता नहीं लगा कि कुल लूटी गई धनराशि का कितना हिस्सा नाईजीरिया लौट सका।

विशेषकर इस बड़े अभियान व उसकी आंशिक सफलता के बावजूद यह नहीं बताया गया कि यह कालाधन जमा करने वाले धनी देशों के किन सफेदपोशों ने उस लूट में क्या भूमिका निभाई थी व कितना हिस्सा अपने लिए (या अपने बैंकों के लिए) हड़पा था। इतना तो स्पष्ट नजर आ रहा था कि इतने बड़े पैमाने की लूट को ठिकाने लगाने में अनेक बड़े बैंकों और उनके अधिकारियों का योगदान रहा होगा। अनुमान लगाया गया है कि विश्व के लगभग 100 बैंक इन सौदों में हिस्सेदार थे जिनमें से विश्व के कुछ सबसे बड़े बहुराष्ट्रीय बैंक भी शामिल हैं। सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिसी, वाशिंगटन, से जुड़े काले धन के अध्ययन के विशेषज्ञ रेमंड बेकर ने बताया है कि एक समय इन विभिन्न बैंकों में अबाचा की अपार दौलत के प्रबंधन के लिए तीखी प्रतिस्पर्धा थी। विभिन्न बैंकों के अधिकारी चाहते थे कि इस तानाशाह का अधिक पैसा उनके पास आए।

बेशक इन बैंकों के अधिकारियों को यह भलीभांति पता था कि वे भ्रष्टाचार के कालेधन को ठिकाने लगा रहे हैं, पर इसके बावजूद वे इसे लेने के लिए न केवल तैयार थे अपितु आपस में खींचतान कर रहे थे कि किसे ज्यादा हिस्सा मिले। आश्चर्य की बात यह है कि इन अधिकारियों व उनके बैंकों की जिम्मेदारी व अपराधिकता को तय करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। पूरी व्यवस्था पहले की तरह चलती रही, बस कुछ धनराशि लौटा दी गई। चूंकि पूरी व्यवस्था वैसी की वैसी बनी रही, अत: कुछ समय बाद नाईजीरिया के कुछ अन्य सत्ताधारियों का पैसा इसमें पहुंचने लगा और इस तरह पूरा चक्र एक बार फिर आरंभ हो गया।

इस तरह के उदाहरण इस समय विशेष तौर पर उपयोगी हैं क्योंकि भारत व कुछ अन्य देशों में भी विदेशों से कालाधन वापस मंगवाने की मांग कई स्तरों पर जोर पकड़ रही है। यह एक बहुत सार्थक मांग है, पर इसके साथ यह सवाल जुड़े हैं कि यह मांग किस रूप में रखी जाती है व वह किसी बुनियादी बदलाव की ओर ले जाती है या नहीं। उदाहरण के लिए भारत में यह मांग प्राय: इस तरह से उठाई गई कि किसी विशेष राजनीतिक दल, व्यक्ति या परिवार को निशाने पर लाया जा सके। अधिक से अधिक इतनी ही मांग रखी गई कि विदेशों में कालाधन जमा रखने वाले लोगों के नाम बताएं जाएं, व उनके इस धन को वापस देश लाया जाए। इस बारे में कुछ नहीं कहा गया कि विदेशों में काले धन को जमा करने का जो बहुत बड़ा व शक्तिशाली सिस्टम बन गया है, उसे हटाना जरूरी है। देश में उन घोर विषमताओं व आर्थिक शक्ति के केन्द्रीकरण को मिटाना जरूरी है जिसके कारण इतने बड़़़े पैमाने का पैसा बाहर पहुंच पाता है। यदि इस तरह की व्यवस्था बदलने की बात नहीं की गई तो अधिक से अधिक उपलब्धि यह हो पाएगी कि एकमुश्त बड़ी धनराशि देश में वापस आ जाएगी, पर उसके बाद फिर यही चक्र शुरू न हो जाए इस संभावना को भी तो रोकना जरूरी है।

विदेशों में जमा कालेधन पर बहुत बोलने वाले कुछ तत्वों की एक कमी यह है कि अपने देश में जमा  कालेधन के बारे में नहीं बोलते हैं, जबकि यह विदेशों से वापस प्राप्त हो सकने वाले कालेधन से भी अधिक है। सच तो यह है कि विदेशों में कालेधन के बारे में बहुत बोलने वाले कुछ तत्व तो स्वयं काले  धन के कारोबार में लगे हैं, या ऐसे कारोबारियों से नजदीकी संबंध रखते हंै। इस तरह पूरा ध्यान विदेशी धन में केंद्रित करने का उनका एक मकसद यह भी है कि अपने देश में जमा कालेधन की ओर लोगों का ध्यान न जाए। सही रणनीति यह होगी कि देशी और विदेशी काले धन पर एक साथ चोट की जाए व उस व्यवस्था को हटाने के प्रयास किए जाए जिसके कारण विभिन्न स्तरों पर काले धन का कारोबार इतनी तेजी पर है।
 

Source:Agency