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दिवालिया कानून में संशोधन अध्यादेश से मझधार में छोटे-मझोले उपक्रम

By Mantralayanews :30-11-2017 08:48


नई दिल्लीः दिवालिया कानून में संशोधन के लिए हाल में लाए गए अध्यादेश ने छोटी और मझोली कंपनियों के पुनर्गठन की राह मुश्किल कर दी है। दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रहीं ऐसी 70 फीसदी कंपनियों पर परिसमापन का खतरा मंडरा रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन कंपनियों की समाधान योजना पेश करने वाले प्रवर्तक ही हैं और अध्यादेश ने उनके कर्ज में डूबी कंपनियों पर बोली लगाने पर पाबंदी लगा दी है।

छोटी-मझोली कंपनियों पर 1.5 लाख करोड़ का कर्ज
विशेषज्ञों का कहना है कि करीब 300 में से 200 कंपनियों पर बंद होने का खतरा है। 12 बड़ी कंपनियों को छोड़ दें तो दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रही बाकी कंपनियों पर 1,50,000 करोड़ रुपए का कर्ज है। 12 बड़ी कंपनियों पर करीब 2,50,000 करोड़ रुपए का कर्ज है। इन्सॉल्वेंसी पेशेवरों ने बताया कि आरईआई एग्रो, हिंद मोटर्स, वीएनआर इन्फ्रास्ट्रक्चर, ब्लॉसम्स ऑयल्स और फैट्स लिमिटेड को हाल ही में परिसमापन में डाला गया है क्योंकि किसी भी तीसरे पक्ष ने समाधान की योजना पेश नहीं की। कुछ और कंपनियां भी परिसमापन की ओर बढ़ रही हैं क्योंकि कोई भी तीसरा पक्ष उनके समाधान की योजना पेश नहीं कर रहा है।

समाधान योजना पेश करने वाले केवल प्रवर्तक
विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी और मझौली कंपनियां दिवालिया कानून के बजाय पुनर्गठन के दूसरे तरीकों का सहारा ले सकती हैं। इनमें स्कीम फॉर ससटेनेबल स्ट्रक्चरिंग ऑफ स्ट्रेस्ड एसेट्स (एस4ए) भी शामिल है जिसके तहत ऋणदाता बैंक को कर्ज में डूबी परियोजना में इक्विटी का अधिग्रहण करने की अनुमति देकर ऐसी परिसंपत्तियों का वित्तीय पुनर्गठन किया जाता है। अलबत्ता कपंनियों का मालिकाना हक प्रवर्तकों के पास ही रहता है। इन्सॉल्वेंसी पेशेवरों के मुताबिक अध्यादेश से शायद बड़ी कंपनियां प्रभावित नहीं होंगी क्योंकि निजी इक्विटी फर्मों सहित कई कंपनियों की इनमें दिलचस्पी होगी। अलबत्ता छोटी और मझोली कंपनियों के साथ परेशानी है जिनमें किसी की दिलचस्पी नहीं होगी। देनदारों के अलावा बैंक भी डिफॉल्टर को राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट में खींच सकते हैं। इस कानून का उद्देश्य यह है कि अगर डिफॉल्टर खुद कंपनी का पुनर्गठन करना चाहता है तो वह भी दिवालिया प्रक्रिया में जा सकता है। 

Source:Agency