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हादिया की मर्जी का सवाल

By Mantralayanews :03-12-2017 08:50


केरल की हादिया अब न मां-बाप के साथ रहेंगी, न अपने पति के साथ, बल्कि वे तमिलनाडु के सलेम में होम्योपैथिक कालेज के हास्टल में रह कर अपनी पढ़ाई पूरी करेंगी। उनके अभिभावक कालेज के डीन होंगे। यह फैसला सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने दिया। इससे पहले चली लंबी सुनवाई में हादिया से जब उनकी मर्जी पूछी गई थी, तो उन्होंने कहा था कि वे अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती हैं। लेकिन यह भी चाहती हैं कि उनकी पढ़ाई का खर्च राज्य सरकार नहीं बल्कि उनके पति उठाएं और वे अपना अभिभावक भी अपने पति को ही बनाना चाहती थीं। मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने इस पर कहा था कि मैं भी अपनी पत्नी का अभिभावक नहीं हूं।

पत्नियां चल संपत्ति नहीं होतीं। यह बात स्त्रियों के सम्मान के लिहाज से बहुत बड़ी है, खासकर तब जबकि समाज में यही माना जाता है कि महिलाओं को पहले पिता, फिर पति और बाद में पुत्र के संरक्षण में रहना चाहिए। लेकिन हादिया के मामले में सवाल यह नहीं है कि उनका अभिभावक कौन हो, सवाल तो यह है कि क्या उन्हें अपनी मर्जी का धर्म मानने और शादी करने का अधिकार है या नहीं। अगर हादिया नाबालिग होतीं तो बेशक उनके अभिभावकों या माता-पिता की मर्जी चलती। लेकिन हादिया 24 बरस की हैं, फिर भी उन्हें इस्लाम कबूलने और एक मुस्लिम युवक शफीन से शादी करने के मसले पर अदालत के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

तमिलनाडु में पढ़ाई करते हुए 2016 में हादिया ने इस्लाम अपनाया था, उनके मुताबिक अपने साथ पढ़नेे वाली दो मुस्लिम लड़कियों को देखकर उन्होंने ये फैसला लिया था। तब उनके पिता ने केरल की अदालत में मुकदमा दर्ज किया कि उनकी बेटी को जबरन मुस्लिम बनाया गया है और उनकी इच्छा के खिला$फ उन्हें पकड़ कर रखा गया है। लेकिन हादिया का पक्ष सुनने के बाद अदालत ने उन्हें अपनी मर्जी से रहने की इजाजत दी। इसके बाद अगस्त 2016 में हादिया के पिता फिर अदालत पहुंचे और दावा किया कि उनकी बेटी भारत से बाहर जा रही है। इस दौरान हादिया की शादी हो चुकी थी और इस बार अदालत ने हादिया का विवाह खारिज करते हुए उनकी कस्टडी उनके माता-पिता को सौंप दीं। 

 
एक 24 बरस की युवती अगर अपना जीवन अपने तरीके से जीना चाहती है, तो भारत का संविधान उसे इसकी इजाजत देता है। लेकिन हादिया के मामले में ऐसा नहीं हुआ। उनके अंतरधार्मिक विवाह को लव जिहाद जैसा अशोभनीय नाम दिया गया और बीते कुछ समय से राजनीति और खबरों की दुनिया में इसे खूब भुनाया जा रहा है। जहां प्रेम होगा, वहां संघर्ष या लड़ाई का क्या काम? लेकिन धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों ने लव जिहाद का जुमला गढ़ लिया और यही प्रचलन में आ गया है। हादिया के पति शफीन के संबंध आईएस से होने के आरोप लगाए गए। हादिया का जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप भी लगा है। इस मामले की जांच एनआईए को अगस्त में सौंपी गई। एनआईए ने अदालत को बताया है कि उसका मानना है कि कुछ मामले ऐसे हैं  जिनमें हिंदू महिलाओं को इस्लाम $कबूल करने के लिए फुसलाया गया है। लेकिन अब तक इनका कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं किया गया है। जहां तक शफीन पर लगे आरोपों का सवाल है, वे भी अभी तक सिद्ध नहीं हुए हैं।

केरल हाईकोर्ट द्वारा शादी रद्द किए जाने के बाद शफीन ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, जिसके बाद हादिया को अपने मां-बाप के संरक्षण से मुक्ति मिली है। लेकिन हादिया और शफीन के वैवाहिक जीवन पर अभी प्रश्नचिह्नï बरकरार है। अब देखना यह है कि देश की न्यायव्यवस्था हादिया के जीवन को उलझाते सवालों का हल किस तरह निकालती है? कैसे एक वयस्क की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बरकरार रखती है? क्या अदालत के फैसले से लव जिहाद या आनर किलिंग जैसी संकुचित अवधारणाएं कमजोर होंगी? सबसे बड़ा सवाल यह कि अगर हादिया, धर्म परिवर्तन से पहले अखिला न होकर अखिल होतीं, यानी लड़की न होकर लड़का होतीं, क्या तब भी इतनी ही राजनीति और इतना ही बवाल खड़ा होता? इन सवालों के जवाब ही हमारे भावी समाज की दशा और दिशा तय करेंगे।
 

Source:Agency