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चुनाव आयोग को खूंखार बनाने वाले टीएन शेषन आज बुरे हाल में हैं

By Mantralayanews :10-01-2018 06:36


देश में एक चुनाव आयोग भी होता है. ये बात देश को पता चली थी नब्बे के दशक में, जब तमिलनाडु काडर के आईएएस अधिकारी टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त बने थे. शेषन ने बिहार में बूथ कैप्चरिंग रोकने के लिए सेंट्रल पुलिस फोर्स का इस्तेमाल किया. कई चरणों में चुनाव करवाए और उसकी तैयारियों के लिए चुनाव को कई बार टाला भी. लालू इतना नाराज हो गए कि शेषन के लिए रैलियों में बोले. भैंसिया पर चढ़ा करके गंगाजी में हेला देंगे. पर शेषन न लालू से डरे और न प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने. उन्होंने सब कुछ नियमों के मुताबिक और सख्ती से किया.

जब-जब टी एन शेषन का जिक्र होगा, लालू यादव की बात निकल ही आएगी. अभी संयोग देखिए. लालू यादव जेल गए हैं. और इधर टी एन शेषन के ओल्ड एज होम में दिन गुजारने की खबर आई है. 
जब-जब टी एन शेषन का जिक्र होगा, लालू यादव की बात निकल ही आएगी. अभी संयोग देखिए. लालू यादव जेल गए हैं. और इधर टी एन शेषन के ओल्ड एज होम में दिन गुजारने की खबर आई है.
शेषन ने वोटर कार्ड बनवाए, ऑबजर्वर तैनात करवाए और रिटायरमेंट के बाद 1997 में राष्ट्रपति का चुनाव लड़कर हारे भी. उसके बाद वो चेन्नै में रिटायरमेंट का जीवन जीने लगे. एक मैनेजमेंट कॉलेज में लीडरशिप पर लेक्चर भी लेते थे. ये सब ‘थे’ में क्योंकि अब शेषन एक ओल्ड एज होम में रहने को मजबूर हैं. ओल्ड एज होम की खबर नवभारत टाइम्स अखबार ने छापी है. इसके रिपोर्टर नरेंद्र नाथ के मुताबिक 85 साल के शेषन को भूलने की बीमारी हो गई है. ऐसे में रिश्तेदारों ने उन्हें चेन्नई के एक बड़े ओल्ड एज होम एमएसएम रेजिडेंसी में शिफ्ट करवा दिया है. वो यहां तीन साल रहे. फिर घर लौट आए. मगर अब भी तबीयत बिगड़ने पर वो ओल्ड एज होम में जाते हैं. और ऐसा अकसर होता है. वो किसी से भी फोन पर बात नहीं करते हैं.

ररकरकरकतम
टी एन शेषन को भूलने की बीमारी हो गई है. शायद डिमेंशिया, जो अक्सर बढ़ती उम्र में होता है. बीमारी के कारण रिश्तेदारों ने उन्हें इस ओल्ड एज होम में शिफ्ट कर दिया.
शेषन सबसे ज्यादा चर्चा में आए थे लालू यादव की नकेल कसने के चलते. उस पूरे प्रकरण को पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब ‘बंधु बिहारी’ में लिखा है. इसके मुताबिक लोगों को लगा कि शेषन ने लालू को ठीक कर दिया, मगर असल में लालू यादव को शेषन की सख्ती का फायदा मिला. इस किताब को छापा है प्रभात प्रकाशन ने. पढ़िए ये मौजू अंश. सिर्फ दी लल्लनटॉप पर:

लेकिन बेशक, वहां वह असंभावित विरोधी भी था, जो उस चुनाव में लालू यादव के खिलाफ उठ खड़ा हुआ था. वह, जिसने लालू यादव के संयुक्त राजनीतिक विरोधियों की तुलना में उनकी कहीं अधिक रातों की नींद खराब की थी- मसीहाई मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन. आगे जाकर वो खुद भी राजनेताओं की श्रेणी में शामिल होकर एक बुरे नेता बननेवाले थे, लेकिन उस समय वो मध्य वर्गीय लोकप्रियता की मौज पर सवार थे, जो उन्होंने ‘राजनीतिज्ञों से नफरत करो’ अभियान से उत्पन्न की थी. पूरी राजनीति और सारे राजनीतिज्ञ गंदे थे, शेषन उस गंदगी को शुद्ध करनेवाले थे. वे स्वयं द्वारा नियुक्त एक सदस्यीय नैतिकता ब्रिगेड थे. उस प्रणाली को साफ करने के लिए, जिसने उन्हें बनाया था और जो आनेवाले वर्षों में उन्हें निगलने वाली थी. शेषन अपनी झाड़ू सबसे अधिक बिहार में ही फिराना चाहते थे, जो चुनावी अनाचार के कूड़े का गड्ढा था- बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान, हेरा-फेरी, हिंसा- सब बिहार में किसी भी चुनाव के अनिवार्य अंग थे. अगर यह सब नहीं होता था, तो बड़ी खबर बन जाती थी. वर्ष 1984 के लोकसभा चुनावों में 24 लोग मारे गए थे और 1989 में 40. वहीं, विधानसभा चुनावों में मतदान के समय वर्ष 1985 में 63 लोग मारे गए थे और 1990 में 87.

बूथ कैप्चरिंग और फर्जी वोटिंग की घटनाओं की कोई गिनती नहीं रखी जाती थी. शेषन ने तय कर लिया था कि वर्ष 1995 के चुनावों में ऐसा कुछ नहीं होने देंगे. बिहार उनकी अंतिम चुनौती था और वहां एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव करवाने को लेकर उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी थी. उन्होंने राज्य में अर्धसैनिक बलों की 650 टुकड़ियों को भेजा. चुनाव को चार चरणों में विभक्त कर दिया. चार बार मतदान स्थगित किया और राज्य प्रशासन को कांटों पर खड़ा रखा- शेषन संहिता के उल्लंघन का जरा सा भी संकेत मिलने पर पूरी चुनाव प्रक्रिया रद्द कर दी जाएगी. शेषन के विस्तृत कठघरों का अंजाम ये हुआ कि बिहार को देश के अब तक के सबसे लंबे विधानसभा चुनावों की यंत्रणा से गुजरना पड़ा. चुनाव आयोग द्वारा ये चुनाव 8 दिसंबर, 1994 को अधिसूचित किया गया और अंतिम मतदान 28 मार्च, 1995 को संपन्न हुआ. वह एक थका देनेवाला चुनाव अभियान था- उम्मीदवार लगभग तीन महीने सड़क पर थे. लालू यादव की सरकार के लिए वह समय सिर-खपाऊ भी था. शेषन का कार्यालय निरंतर सवाल पूछता रहता था और निर्देशों का पालन न होने की स्थिति में कड़े परिणाम की धमकी देता रहता था. लेकिन लालू यादव ने इस विलंब और लंबे समय के अभियानों का अच्छा फायदा उठाया।

सार्वजनिक रूप से बेशक उन्होंने क्रोध और तिलमिलाहट का प्रदर्शन किया और शेषन के खिलाफ प्रख्यात धमकियां प्रेषित कीं- ‘भैंसिया पर चढ़ा करके गंगाजी में हेला देंगे.’ उनमें से एक थी, लेकिन निजी तौर पर वे प्रसन्नता के साथ मुंह दबाकर हंस रहे थे. उस लंबे चुनाव अभियान ने उनकी सबसे अधिक मदद की थी- संभार तंत्रानुसार भी और राजनीतिक रूप से भी. वोटरों को लुभाने की क्षमता पार्टी में सिर्फ उन्हीं के पास थी. इसीलिए तीन महीने के चुनाव अभियान ने उन्हें राज्य के सुदूर कोनों तक पहुंचने का पर्याप्त समय दे दिया. इसके अलावा, इतने लंबे समय तक अभियान को बनाए रखने में उन्हें कम समस्याओं का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनके पास सरकारी मशीनरी का समर्थन था, जितना और जो भी चुनाव के शेषन युग में संभव था. मैदान में लालू यादव की सांस फूलने के बहुत पहले ही शेष खिलाड़ी थक चुके थे और राजनीतिक रूप से जितनी बार चुनाव स्थगित हुए, लालू यादव अपने निर्वाचन क्षेत्र में यह घोषणा करके अपना लाभ निकालने में सफल रहे कि शेषन, कांग्रेस और भाजपा, ‘सभी सवर्णों के प्रतीक वंचितों और पिछड़ी जातियों से बिहार पर शासन करने का उनका अधिकार छीनने की साजिश रच रहे थे.’ वी.पी. सिंह, जो अस्वस्थ थे और राजनीति से आत्मारोपित अर्ध-सेवानिवृत्ति ले चुके थे, साजिश के कोण को सहारा देने स्वयं बिहार आए. बिहार में उन्होंने चुनाव के तीसरे स्थगन के बाद सार्वजनिक सभाओं की एक शृंखला को संबोधित करते हुए कहा, ‘मंडल को पलटकर पुरानी शोषक व्यवस्था को वापस लाने का निश्चित और निर्धारित प्रयास किया जा रहा है.’ लालू यादव का वोट बैंक और समृद्ध हो गया.

बहुत से लोग, जिनमें लालू यादव के अपने सहयोगी और मित्र भी शामिल थे, वर्ष 1995 में लालू की जीत के स्तर से हैरान थे, लेकिन स्वयं लालू हैरान नहीं थे. वे अपने बोए बीजों की गुणवत्ता से परिचित थे. उन्हें विश्वास था कि उनकी फसल अच्छी होगी. उन्होंने अपनी जीत के जश्न की व्यवस्थाओं को उसी दिन अंतिम रूप दे दिया था, जिस दिन मतदान समाप्त हुआ था. 1, अणे मार्ग पर उत्सव की शुरुआत पहला परिणाम आते ही शुरू हो गई थी. लोक संगीतकारों का एक दल विशेष रूप से लालू यादव के मूल निवास गोपालगंज जिले से बुलाया गया था- वो सस्ते से झांझ और कैस्टानेट्स, घिसे-पिटे ड्रम, कमजोर पड़ चुकी तुरही के साथ आए थे. उनके दल में करीब आधा दर्जन लोग थे, जो किसी मुफस्सिल बैंड से उधार ली हुई वर्दी में सजे-धजे थे, जिसे धोने या प्रेस करने का उन्हें समय नहीं मिला था. 30 मार्च, 1995 की दोपहर तक यह स्पष्ट हो गया था कि लालू यादव जीत जाएंगे. उनको एक के बाद एक लगातार सीटें मिलती जा रही थीं. उनकी हवेली के द्वार खोल दिए गए थे और उनके वफादार अंदर आते जा रहे थे. 1, अणे मार्ग का लॉन लोगों से और उनकी उत्साहित चर्चाओं व नारों से भरता जा रहा था.

लॉन के बीच में लालू यादव और उनके मंत्रियों के दल के लिए कुर्सियां सजा दी गई थीं. लेकिन जब नेताजी अपने बंगले से बाहर निकले, ईसा मसीह की तरह बांहें आधी फैलाए, तो वे सीधे अपने लोक संगीतकारों के पास चले गए और उनके साथ बैठ गए. आज वे बजाएंगे और लालू यादव गाएंगे. आज वे अपने फुलवरिया के और बचपन के दिनों में लौट जाएंगे. उन्होंने किसी एक से खैनी मांगी और फिर अपना पाजामा ऊपर चढ़ाकर नाचने लगे. उनके दर्शक आनंदित हो रहे थे. उनकी पार्टी तो बेशक जीत ही गई थी, साथ ही लालू यादव ने अपनी दोनों सीटों- दानापुर और राघोपुर- से भारी बढ़त से विजय हासिल कर ली थी. ‘देखो, देखो,’ वे चिल्लाए, ‘देखो, ऐसे ही बिहार का असली लोग मजा करता है.’
 

Source:Agency