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Date 22-01-18

रोजगार बनाने का बजट

By Mantralayanews :11-01-2018 07:43


'मेक इन इंडिया'  सफल हो भी जाये तो भी रोजगार की स्थिति दयनीय बनी रहेगी। मैन्यूफैक्चरिंग में उन उद्योगों को चिह्नित करना चाहिये जहां आटोमेटिक मशीनों से उत्पादन करना संभव नहीं है जैसे खादी, हैंडलूम, हस्तकला, फर्नीचर इत्यादि। सरकार को चाहिए कि तमाम उत्पादित माल का सर्वेक्षण कराये और इन्हें 'अधिक श्रम'  एवं  'न्यून श्रम'  की श्रेणियों में विभाजित करे। जैसे फर्नीचर 'अधिक श्रम' और पेट्रोल  'न्यून श्रम'  की श्रेणी में वर्गीकृत हुआ। तब 'अधिक श्रम'  के उत्पादों पर जीएसटी घटाये और 'न्यून श्रम' के उत्पादों पर जीएसटी बढ़ाये। ऐसा करने से उद्योगों पर टैक्स का कुल भार पूर्ववत् रहेगा परन्तु श्रम सघन उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा। जीएसटी की दरों को उत्पादन प्रणाली के आधार पर भी घटाया जा सकता है। 

शीघ्र ही वित मंत्री आगामी वर्ष का बजट पेश करेंगे। इस समय प्रमुख चुनौती रोजगार बनाने की है। कृषि में रोजगार का हनन तेजी से हो रहा है। ट्यूबवेल, थ्रेशर तथा ट्रैक्टर ने खेती में श्रम की जरूरत कम कर दी है। सामान्य फसलों जैसे धान, गेहूं एवं गन्ने के उत्पादन में रोजगार कम ही बनेंगे। लेकिन दूसरे उत्पादों में रोजगार बन सकते हैं। नीदरलैण्ड एक छोटा सा यूरोपीय देश है। वहां ट्यूलिप की खेती बड़े पैमाने पर होती है। पूरे विश्व को वहां से ट्यूलिप की सप्लाई होती है। अपने देश में हर तरह की जलवायु उपलब्ध है। हम पूरी दुनिया को गुलाब, ग्लेडियोलस, गुलदाउदी एवं ट्यूलिप जैसे फूलों की सप्लाई बारहों महीने कर सकते हैं। इन उच्च कीमत वाले माल के उत्पादन में रोजगार बन सकते हैं। इसी प्रकार विशेष आकार के फलों, आर्गनिक शहद एवं जैतून के तेल के निर्यात की अपार सम्भावना अपने देश में मौजूद है। यदि नीदरलैण्ड के किसान अपने कर्मचारियों को ट्यूलिप के उत्पादन के लिए 8,000 रुपए की दिहाड़ी दे सकते हैं तो हमारे किसान क्यों नहीं दे सकते। वित्त मंत्री को चाहिये कि सामान्य कृषि उत्पादों जैसे गेहूं एवं चीनी के निर्यात पर निर्यात टैक्स वसूल करके उपरोक्त उच्च कीमत वाले उत्पादों को सब्सिडी दें। साथ-साथ इन निर्यातों के लिए आवश्यक बुनियादी संरचना जैसे एयरपोर्ट पर फसल निर्यात के अलग स्थान बनाने पर निवेश बढ़ायें। इन फसलों के उत्पादन में रोजगार बनेंगे। कृषि को करवट बदलने का समय आ गया है। 

मैन्यूफैक्चरिंग में आटोमेटिक मशीनों एवं रोबोटों का उपयोग बढ़ रहा है। किसी चीनी मिल में 50 वर्ष पूर्व 2,000 कर्मचारी कार्य करते थे और प्रतिदिन 2,000 टन गन्ना पेरा जाता था। आज उसी मिल में मात्र 500 कर्मचारी कार्य करते हैं और 8,000 टन गन्ना पेरा जाता है। तमाम कार्य जैसे गन्ने को ट्रक से उतारना, खोई को बायलर में झोंकना एवं संट्रीफूगल में चीनी को साफ करना इत्यादि आटोमेटिक मशीनों से किया जाने लगा है। पूंजी के सस्ते होते जाने के कारण आटोमेटिक मशीनों में निवेश करना सहज हो गया है। अत: वर्तमान में मैन्यूफैक्चरिंग में रोजगार घटने लगे हैं। भविष्य में यह निरंतर घटेगा और रोजगार की समस्या गहरायेगी।  'मेक इन इंडिया' सफल हो भी जाये तो भी रोजगार की स्थिति दयनीय बनी रहेगी।

मैन्यूफैक्चरिंग में उन उद्योगों को चिह्नित करना चाहिये जहां आटोमेटिक मशीनों से उत्पादन करना संभव नहीं है जैसे खादी, हैंडलूम, हस्तकला, फर्नीचर इत्यादि। सरकार को चाहिये कि तमाम उत्पादित माल का सर्वेक्षण कराये और इन्हें  'अधिक श्रम' एवं 'न्यून श्रम' की श्रेणियों में विभाजित करे। जैसे फर्नीचर 'अधिक श्रम' और पेट्रोल 'न्यून श्रम' की श्रेणी में वर्गीकृत हुआ। तब 'अधिक श्रम' के उत्पादों पर जीएसटी घटाये और 'न्यून श्रम' के उत्पादों पर जीएसटी बढ़ाये। ऐसा करने से उद्योगों पर टैक्स का कुल भार पूर्ववत रहेगा परन्तु श्रम सघन उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा। जीएसटी की दरों को उत्पादन प्रणाली के आधार पर भी घटाया जा सकता है। जैसे आटोमेटिक मशीन से बनाये गये बिस्कुट और डबलरोटी पर जीएसटी बढ़ाया जाये तथा हाथ से बने इन्हीं माल पर जीएसटी घटाया जाये। 

कम्प्यूटर आधारित इन्फारमेशन टेक्नोलाजी (आईटी) में भारत की महारत सर्वविदित है। यहां भी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का खतरा मंडरा रहा है। मेरे जानकार साफ्टवेयर इन्जीनियर ने बताया कि वर्तमान में यदि कोई कम्पनी नया साफ्टवेयर खरीदती है तो उसे लागू करने को इंजीनियरों की जरूरत होती है। अब यह कार्य क्लाउड प्लेटफार्म पर होने लगा है। खरीदार द्वारा क्लाउड से साफ्टवेयर के उन हिस्सों को डाउनलोड करके उपयोग किया जाता है जिसकी उनको जरूरत है। इस उपयोग के लिए साफ्टवेयर इंजीनियर को रोजगार देना जरूरी नहीं रह गया है। फलस्वरूप साफ्टवेयर के क्षेत्र में रोजगार के संकुचन की सम्भावना है। लेकिन तमाम ऐसे कम्प्यूटर आधारित गेम्स आदि हैं जिनका बाजार तेजी से बढ़ेगा।

 
मेट्रो अथवा रेल स्टेशन पर आप देख सकते हैं कि दर्जनों लोग मोबाइल से चिपके रहते हैं। मोबाइल आधारित प्रोग्राम की मांग बढ़ेगी। सरकार को इनके उत्पादन को बढ़ावा देना चाहिये। इस दिशा में बजट में छोटे डाटा पैकों पर टैक्स की दर कम और वायस फोनों पर टैक्स की दर में वृद्धि की जा सकती है। छोटा डेटा पैक सस्ता होने से युवाओं के लिए इस क्षेत्र में प्रवेश आसान हो जायेगा। साथ-साथ विदेशी भाषाओं को प्रोत्साहन देना चाहिये। आईआईटी तथा आईआईएम की तर्ज पर हर राज्य में 'इंडियन इंस्टीट्यूट आफ फॉरेन लैंग्वेजेज; स्थापित करनी चाहिये जहां जापानी से स्पैनिश जैसे अनुवाद करने की टे्रनिंग दी जाये। सरकार को 'स्किल; बढ़ाने के पचड़े में सीधे नहीं पड़ना चाहिये। स्किल के नाम पर तमाम एनजीओ द्वारा फर्जीवाड़ा चल रहा है। कम्प्यूटर तथा विदेशी भाषाओं में रोजगाार बढ़ेंगे तो युवा उपयुक्त स्किल को स्वयं हासिल कर लेंगे।

विकास के साथ-साथ सेवाओं का अर्थव्यवस्था में हिस्सा बढ़ता है। सेवाओं में स्वास्थ्य और शिक्षा प्रमुख हैं। इन सेवाओं की खूबी है कि इन्हें रोबोट द्वारा कम ही उपलब्ध कराया जा सकता है। जैसे बालक को गणित का ट्यूटोरियल देना हो तो साफ्टवेयर की सीमा है। मेरे जानकार एक मित्र विदेशी छात्रों को कम्प्यूटर के माध्यम से ट्यूटोरियल देती हैं और उनकी आमदनी भी अच्छी है। विदेशों में स्वास्थ्य सेवायें एवं शिक्षा बहुत महंगी हैं। दांत के रूट केनाल ट्रीटमेंट का अमेरिका में 70,000 रुपए लगते हैं जबकि भारत में 3,500 रुपए। तीन दांत का रूट केनाल करना हो तो अमेरिकी ग्राहक के लिए यह सस्ता पड़ता है कि वह दिल्ली आये और करा ले। हमारे तमाम युवा आस्ट्रेलिया, इंग्लैण्ड तथा अमेरिका शिक्षा प्राप्त करने को जाते हैं। हमारे लिए संभव है कि एशिया, अफ्रीका एवं दक्षिणी अमेरिका के छात्रों को यहां लाकर शिक्षा दें।

परन्तु अपने देश में विदेशियों के प्रति नफरत का वातावरण है विशेषत: मंगोलयाड एवं निग्राएड नस्ल के लोगों के प्रति। सरकार को चाहिये कि स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवाओं के निर्यात के लिए जीएसटी में छूट दे। इन्हें बढ़ाने के लिये एक सार्वजनिक इकाई बनाये जो विभिन्न देशों में शाखायें खोलकर वहां के युवाओं को भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवायें खरीदने को प्रेरित करे। सरकार को सरकारी अस्पतालों एवं विद्यालयों के विस्तार पर पूर्णविराम लगा देना चाहिये और इस रकम को निर्यात में लगाना चाहिये। 

इन सुझावों को लागू करने में मूल समस्या जीएसटी के अन्तर्गत एकल टैक्स दर की तरफ  बढ़ने की है। सोच है कि एक टैक्स दर से विवाद कम होंगे, अर्थव्यवस्था सरल और गतिमान होगी। परन्तु यह भूला जा रहा है कि यह गतिमानता रोजगार भक्षण की दिशा में होगी न कि रोजगार सृजन की दिशा में। बजट की सामाजिक दायित्वों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका है। टैक्स के सरलीकरण के नाम पर समाज का स्वाहा नहीं करना चाहिये। बजट को सामाजिक दायित्वों की पूर्ति करनी चाहिये चाहे इसमें जटिलता क्यों न हो।
 

Source:Agency