Breaking News

Today Click 540

Total Click 3949255

Date 19-10-18

आंध्रप्रदेश को विशेष दर्जा की मांग का औचित्य

By Mantralayanews :13-03-2018 07:52


तेलगुदेशम नेताओं के अनुसार, वैसे तो केन्द्र सरकार से उनकी कुल मांगें 19 हैं किन्तु उनका खुलासा वे धीरे-धीरे करेंगे। वे अपनी मांगों को मनवाने के लिए केवल धरना प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रखेंगे बल्कि आंध्रप्रदेश की जनता को न्याय दिलवाने के लिए वे शीघ्र सर्वोच्च न्यायालय भी जाएंगे। फिलहाल सबसे पहले वे सभी सांसदों को पत्र लिखकर अपनी न्यायोचित मांगों से अवगत करवाते हुए उनसे समर्थन के लिए अनुरोध करेंगे। जहां तक विशेष राज्य दर्जा का सवाल है भारतीय संविधान में प्रारंभ में इसकी कोई व्यवस्था नहीं थी। किन्तु पर्वतीय सीमांत राज्यों की दुर्गम स्थिति से उपजे पिछड़ेपन को दूर करने के विशेष केन्द्रीय सहायता हेतु राष्ट्रीय विकास परिषद की सलाह पर केन्द्र सरकार ने 1969 में संविधान में अनुच्छेद 371 जोड़कर जम्मू-कश्मीर, असम और नगालैंड इन राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया था।

तेलगुदेशम पार्टी के दोनों मंत्रियों ने 8 मार्च को केन्द्र सरकार द्वारा आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न दिए जाने तथा अन्य कतिपय मांगों को अनदेखा किए जाने के विरोध में केंद्रीय मंत्रिमंडल से  त्यागपत्र दे दिया। त्यागपत्र देनेवाले मंत्रियों के अनुसार उनके त्यागपत्र देने के बावजूद फिलहाल तेलगुदेशम पार्टी एनडीए में बनी रहेगी। इस प्रकार तेलगुदेशम पार्टी के सांसदों द्वारा बजट पेश होने के बाद पहले कार्य दिन 5 फरवरी से संसद के दोनों सदनों में हर दिन हंगामा करके बजट कार्यवाही बाधित करने की परिणति मंत्रियों के त्यागपत्र के रूप में हुई है। तेलगुदेशम संासदों के अनुसार 2012 में नए आंध्रप्रदेश राज्य के गठन के समय तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार द्वारा आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने का वादा किया गया था। इसके अलावा केन्द्र सरकार ने आंध्रप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के अंतर्गत राज्य विधानसभा की सीटें 175 से बढ़ाकर 225 करने, पोलावरम परियोजना के लिए 58 हजार करोड़ रुपए की मंजूरी तथा आंध्रप्रदेश की नई राजधानी के विकास के लिए पर्याप्त बजट आबंटन के वादे भी किए थे। टीडीपी प्रमुख चन्द्रबाबू नायडू का केन्द्र सरकार पर आरोप है कि राज्य द्वारा बार- बार वित्तीय सहायता के अनुरोध व वादाखिलाफी के कारण नए राज्य को घोर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है।

तेलगुदेशम नेताओं के अनुसार, वैसे तो केन्द्र सरकार से उनकी कुल मांगें 19 हैं किन्तु उनका खुलासा वे धीरे-धीरे करेंगे। वे अपनी मांगों को मनवाने के लिए केवल धरना प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रखेंगे बल्कि आंध्रप्रदेश की जनता को न्याय दिलवाने के लिए वे शीघ्र सर्वोच्च न्यायालय भी जाएंगे। फिलहाल सबसे पहले वे सभी सांसदों को पत्र लिखकर अपनी न्यायोचित मांगों से अवगत करवाते हुए उनसे समर्थन के लिए अनुरोध करेंगे। जहां तक विशेष राज्य दर्जा का सवाल है भारतीय संविधान में प्रारंभ में इसकी कोई व्यवस्था नहीं थी। किन्तु पर्वतीय सीमांत राज्यों की दुर्गम स्थिति से उपजे पिछड़ेपन को दूर करने के विशेष केन्द्रीय सहायता हेतु राष्ट्रीय विकास परिषद की सलाह पर केन्द्र सरकार ने 1969 में संविधान में अनुच्छेद 371 जोड़कर जम्मू-कश्मीर, असम और नगालैंड इन राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया था। बाद में अनुच्छेद 371 में विभिन्न उप-अनुुच्छेद जोड़कर अन्य 8 पर्वतीय राज्यों को यह दर्जा दिया जा चुका है।

राष्ट्रीय विकास परिषद ने विशेष राज्य का दर्जा के लिए राज्य में दुरूह पर्वतीय क्षेत्र, पड़ोसी देशों से लगी सीमा पर संवेदनशील स्थिति, जनसंख्या का निम्न घनत्व, आर्थिक पिछड़ापन, कमजोर अधोसंरचना तथा बिना केन्दीय वित्तीय सहायता के विकास की नगण्य संभावनाएं, ये मानदंड निर्धारित किए थे । पिछड़े  राज्यों के मुख्यमंत्रीगण इन मानदंडों को भलीभांति जानते हुए भी  राष्ट्रीय  विकास परिषद की सालाना बैठकों में राज्य को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग रखते थे जिनमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अग्रणी रहे हैं। हर एक राज्य के विशेष राज्य दर्जा पाने के लिए लालायित रहने का प्रमुख कारण राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा बनाई गई वह अहर्ता है जिसके तहत विशेष दर्जा राज्य को योजना आयोग के माध्यम से राज्य सरकार की विकास योजनाओं के लिए केन्द्र से 90 प्रतिशत वित्तीय सहायता अनुदान के रूप तथा 10 प्रतिशत ब्याज रहित कर्ज के रूप में उपलब्ध करवाई जाएगी।

 
तेलगुदेशम पार्टी का केन्द्र सरकार पर आरोप रहा है कि उसने आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के वादे का पालन नहीं किया है। लेकिन वस्तुस्थिति भिन्न है।  2012 में आंध्रप्रदेश के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 371 में जोड़े गए 371 -द- के प्रावधानों में कहीं भी आंध्रप्रदेश को विशेष दर्जा राज्य के लिए वैसे प्रावधानों का जिक्र नहीं किया गया है जैसा कि विशेष दर्जा प्राप्त 11 राज्यों के संबंध में अनुच्छेद 371 की धाराओं में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि 2014 में मोदी सरकार द्वारा योजना आयोग भंग कर दिए जाने से राज्यों की योजनाओं के लिए धन उपलब्ध करवाने वाला संस्थान ही अब अस्तित्व में नहीं है। योजना आयोग का स्थान नीति आयोग ने ले लिया है जो केन्द्र से राज्यों को वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाने वाला संस्थान नहीं है। विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने वाली निकाय भी मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रीय विकास परिषद भी निष्क्रिय कर दी गई है। यह भी उल्लेखनीय है कि 14वें वित्त आयोग ने योजना एवं गैर-योजना का अन्तर ही समाप्त करते हुए राज्यों को केन्द्रीय राजस्व में हिस्सा बढ़ाकर 42 प्रतिशत करके राज्यों की योजनाओं हेतु योजना आयोग द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता की क्षतिपूर्ति कर दी गई है।

यहां यह भी चर्चा करना जरूरी है कि  2013 में  वित्त मंत्रालय के तत्कालीन प्रमुख सलाहकार डॉ. रघुराज राजन की अध्यक्षता में विशेष राज्य का दर्जा निर्धारित करने हेतु गठित समिति अपनी रिपोर्ट में विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करने की अनुशंसा कर चुकी है। ऐसी बात  नहीं कि तेदेपा एवं उसके प्रमुख चन्द्रबाबू नायडू इन तथ्यों से अनजान हैं। संभवत: आन्ध्रप्रदेश की कमजोर वित्तीय स्थिति एवं चुनावी वादे पूरे नहीं कर पाने का सारा दोष केन्द्र सरकार पर मढ़ने के लिए राजनीतिक रणनीति के तहत संसद में हंगामा के बाद मंत्रियों के त्यागपत्र दिलवाए गए हैं। जहां तक आंध्रप्रदेश में विधानसभा सीटें 175 से बढ़ाकर 225 किए जाने का सवाल है। इसकी प्रक्रिया प्रारंभ होने के पहले ही हर राज्य से विधानसभा की सीटों में बढोतरी हेतु आन्दोलन प्रारंभ हो जाएंगे।  जहां तक आंध्रप्रदेश में तथाकथित घोर वित्तीय संकट का सवाल है उसके लिए सत्तारूढ़ दल तेदेपा स्वयं भी जिम्मेदार है, जिसने केन्द्र से वित्तीय मदद की प्रत्याशा में अपने खर्चों पर लगाम नहीं लगाई।

इस संबंध में 1 नवंबर 2000 को मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद नए छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के  बाद राज्य को विरासत में मिली दयनीय वित्तीय स्थिति एवं सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से वित्तीय मजबूती पर यहां चर्चा करना सार्थक होगा । छत्तीसगढ़ के तत्कालीन वित्तमंत्री रामचन्द्र सिंहदेव द्वारा अपनाए गए कड़े वित्तीय अनुशासन एवं उपायों से राज्य की मजबूत वित्तीय की बुनियाद रखी गई थी। उदाहरण के लिए तत्कालीन सरकार ने राज्य शासन के सभी निगमों, आयोगों व निकायों को भंग कर दिया एवं राज्य के राजस्व की संभावनाओं को देखते हुए विकास मदों पर भी सीमित व्यय किया।  छत्तीसगढ़ ने अपने राजस्व चादर की लम्बाई के अनुसार पैर पसारे एवं जैसे-जैसे चादर की लंबाई बढ़ती गई, राज्य सरकार के खर्च भी उसी अनुपात में बढ़ते गए। यदि आंध्रप्रदेश के मुखिया अपने अधिकारियों को छत्तीसगढ़ भेजकर यहां की राजकोषीय रणनीति का अध्ययन करवाकर आंध्रप्रदेश में भी छत्तीसगढ़ सरीखा वित्तीय अनुशासन अपनाते तो संभवत: वर्तमान वित्तीय संकट की नौबत नहीं आती।
 

Source:Agency