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बारादरीः जनतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं

By Mantralayanews :08-04-2018 05:59


भाजपा सांसद और दलित चिंतक उदित राज का कहना है कि सामाजिक न्याय लाने की दिशा में भारत का बौद्धिक वर्ग नाकाम रहा है। अनुसूचित जाति/ जनजाति अत्याचार निरोधक अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के बाद हुए भारत बंद को लेकर उन्होंने कहा कि यह आंदोलन राजनीतिक नेतृत्व के बिना स्वत: शुरू हुआ। भाजपा सांसद के मुताबिक, गृहयुद्ध जैसे हालात बनने के पहले हम मान लें कि कमजोर तबकों में आक्रोश है और इसका समाधान निकाला जाए। बारादरी का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र : सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति/ जनजाति संबंधी कानून में जो बदलाव किया, क्या वह ऐसा है कि उसके लिए इतना बड़ा अंदोलन खड़ा हो गया?
उदित राज : सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा बदलाव किया है। अब तब तक गिरफ्तारी नहीं हो सकती, जब तक कि आरोपी के बारे में उसका नियोक्ता या ऊपर का अधिकारी लिख कर नहीं दे देता। इसके लिए उसे कारण भी बताना होगा कि उसे क्यों गिरफ्तार किया जाना चाहिए। सामान्य लोगों के मामले में एसएसपी को लिख कर देना पड़ेगा। दोनों स्थितियों में पक्षपात और पूर्वग्रहग्रस्त होने या रिश्वत लेकर मामले को बदल देने की आशंका बनी रहेगी। इसके अलावा राजनीतिक दबाव में भी पक्षपात किया जा सकता है। माना कि इस कानून का कुछ दुरुपयोग हुआ है, पर इसे इतना डाइल्यूट करने की जरूरत नहीं थी। इसे लेकर नाराजगी इसलिए भी है कि इसी नजरिए से दूसरे कानूनों को क्यों नहीं देखा। आज स्थिति यह है कि चाहे कोई बड़ा अधिकारी हो या मंत्री हो, वह किसी महिला से अकेले में नहीं मिलना चाहता। किसी महिला को कमरे में बिठा देता है। इस तरह नुकसान महिलाओं का ज्यादा हुआ है। महिलाओं की नियुक्तियां कम हो गई हैं। इसी तरह दहेज निरोधक कानून का भी खूब दुरुपयोग होता था। इस कदर कि कनाडा में बैठे व्यक्ति को भी गिरफ्तार कर लिया जाता था। अब जाकर उस कानून में कुछ बदलाव किया गया है। इस तरह समाज में कई तरह की विकृतियां आई हैं। इन स्थितियों को भी दुरुस्त करने की जरूरत है।
मृणाल वल्लरी : महिलाओं पर अत्याचार खूब बढ़े और दुरुपयोग के चुनिंदा मामले। और, आप महिलाओं के लिए बने कानूनों के दुरुपयोग का हवाला दे रहे हैं कि इस वजह से उन्हें नौकरी नहीं मिल रही?
’नहीं, मैं हर तरह के कानून के दुरुपयोग के खिलाफ हूं। कई ऐसे कानून हैं, जिनका दुरुपयोग होता है। महिलाओं से जुड़े कानूनों में पुलिस चाहते हुए भी उनके दुरुपयोग को रोक नहीं सकती। वह जानता है कि गलत है, पर उसकी बाध्यता है कि उसे एफआइआर लिखनी पड़ेगी।

अजय पांडेय : सर्वोच्च न्यायालय का फैसला तो अब आया है, पर इसके पहले कई ऐसी घटनाएं हुर्इं, जिससे दलित समुदाय के बीच आक्रोश था। क्या आपको नहीं लगता कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला तात्कालिक कारण बना उस सारे आक्रोश के फूटने का?
’सही बात है। इसके पीछे कई कारण हैं। एक कमजोर वर्ग से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि भारत बंद कर देगा। सशक्त जातियां जैसे जाट, गुर्जर, पटेल तो बंद कर देते थे, पर दलित इस तरह एकजुट होंगे, किसी को अंदाजा नहीं था। इसमें राजनीतिक लोगों का बिल्कुल योगदान नहीं रहा। उस दिन जरूर कुछ लोगों ने भुनाने का प्रयास किया। यह आक्रोश बेरोजगार युवाओं का था। पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है कि रोजगार के नए अवसर नहीं उपलब्ध हो पा रहे हैं। ठेका पद्धति लागू हो गई है। इसे लेकर लंबे समय से युवाओं में आक्रोश जमा था। यह एक दिन में नहीं हुआ। वह भी इस आंदोलन में फूटा।

पारुल शर्मा : इस तरह के विरोध से बचने का उपाय क्या है?
’इसमें विरोध कई तरह का है। मिलाजुला। सुप्रीम कोर्ट की वजह से तो है ही। इसमें सिर्फ सुप्रीम कोर्ट नहीं, बल्कि पूरी न्यायपालिका को लेकर विरोध भरा हुआ है। एक उदाहरण से इसे समझें- अगर कोई न्यायाधीश महोदय किसी वकील का नाम जज के लिए प्रस्तावित करते हैं, तो उस वकील की परीक्षा नहीं होती। उसका इंटरव्यू नहीं होता। उनके द्वारा लड़े गए मुकदमों का विश्लेषण भी नहीं होता। मुख्य न्यायाधीश किसी को भी न्यायाधीश बना देते हैं। आप देखें कि बीस घरानों के इर्द-गिर्द सारे जजों की नियुक्ति सिमटी हुई है। जहां कोई मेरिट नहीं, वे देश का मेरिट तय कर रहे हैं! उसमें अनुसूचित जाति/ जनजाति/ अन्य पिछड़ा वर्ग को कभी चुना ही नहीं। तो, इस तरह बहुत दिनों से चला आ रहा था कि न्यायपालिका हमारी दुश्मन है। इसी तरह पदोन्नति के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लेकर भी आक्रोश था। फिर हजारों सालों से जातीय भेदभाव के कारण दलितों को जो अपमान सहना करना पड़ रहा है, उसका दंश तो है ही। यह सब मिल कर फूटा। यह एक तरह से आंतरिक संघर्ष ही है। और यह सब एकदम से नहीं बदलेगा। जब तक इन वर्गों की भागीदारी नहीं बढ़ेगी, तब तक सिर्फ नारों या अखबारों में लेख लिख देने से नहीं बदलाव होगा।

सूर्यनाथ सिंह : यह आंदोलन बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के, स्वत: शुरू हुआ था। क्या यह इस बात का संकेत है कि इन वर्गों के लोगों का राजनीतिक नेतृत्व पर भरोसा कमजोर हुआ है?
’यह आंदोलन राजनीतिक नेतृत्व के बिना हुआ। इसे राजनीतिकों से मोहभंग भी कह सकते हैं। दरअसल, अंदर-अंदर यह बात लंबे समय से सुलग रही थी और उबर आई। इसमें किसी राजनीतिक दल का योगदान नहीं है। बेहतर है कि हम सच्चाई को स्वीकार करें। हम मान लें कि लोगों में आक्रोश है और इसका समाधान निकाला जाए। वही देश के हित में है।

अनुराग अन्वेषी : इस बार का आंदोलन जिस तरह हिंसक हुआ, उसे किस रूप में देखते हैं?
’दलित वर्ग का सत्ता से बहुत लेना-देना है नहीं। इसकी जड़ समाज में है। सरकार चाहे जिस पार्टी की आए, वह दबाने का काम करेगी। हां, थोड़ा-बहुत फर्क पड़ सकता है। यह जो आंकड़े गिनाए जाते हैं कि अमुक सरकार में इतने दलित प्रतिनिधि हैं, अमुक में इतने थे, वह सब फिजूल है। जब तक समाज के भीतर बदलाव नहीं होता, तब तक ये चीजें समाप्त नहीं होंगी। हमारे देश में अब तक सामाजिक बदलाव हुआ नहीं। इसमें दो बड़े मुद्दे मैं मानता हूं। एक, जाति का प्रश्न और दूसरा महिला का। इन दोनों वर्गों को संबोधित किया ही नहीं गया। सरकारी पद देकर महिलाओं का उत्थान नहीं किया जा सकता, जब तक कि उन्हें आजादी न दी जाए। इसी तरह जब तक सामाजिक बदलाव का प्रयास नहीं होगा, तब तक दलित वर्गों का उत्थान नहीं हो सकता। इसमें बौद्धिक वर्ग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है।
 

Source:Agency