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जिम्बाब्वे की बोमा तकनीक से कानन के चीतलों की शिफ्टिंग

By Mantralayanews :08-04-2018 07:02


बिलासपुर । कानन पेंडारी जू के चीतलों की अचानकमार टाइगर रिजर्व में शिफ्टिंग की जाएगी। सावधानीपूर्वक शिफ्टिंग पूरी हो जाए इसके लिए वन विभाग जिम्बाब्वे की बोमा तकनीक अपनाएगा। राजनांदगांव में इस तकनीक का सफल प्रयोग हुआ है। अब तक लगभग 30 से 32 जंगल में छोड़े जा चुके हैं।

चीतलों की संख्या तेजी से बढ़ती है। केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण का नियम है कि किसी भी जू में 30 से अधिक चीतलों को नहीं रखा जा सकता है। संवेदनशील होने के कारण संख्या अधिक होने पर खतरा भी रहता है। प्राधिकरण के निर्देश हैं कि संख्या बढ़ने पर उन्हें जंगल, अभ्यारण या फिर टाइगर रिजर्व में छोड़ा जाए। कानन पेंडारी जू में अभी चीतलों की संख्या बढ़कर 110 हो गई है। इसकी शिफ्टिंग की योजना है।

साथ ही अनुमति के लिए प्रस्ताव भी मुख्यालय भेजा गया। अभी अनुमति नहीं मिली है। हालांकि तैयारी पूरी कर ली गई है। इसके लिए वही तकनीक अपनाई जाएगी जिससे राजनांदगांव में शिफ्टिंग हो रही है। वहां मनघटा क्षेत्र में 500 से अधिक चीतल हैं। पत्थर खदान की दखअंदाजी के कारण इन चीतलों पर शामत आ गई थी। पहले वन विभाग ने इन खदानों को बंद कराया और उसके बाद शिफ्टिंग की जा रही है।

यह है बोमा तकनीक

इस तकनीक में चाढी सरीका कारीडोर बनाया जाता है। सामने 40 मीटर चौड़ाई होती है जो धीरे- धीरे आगे जाकर डेढ़ मीटर हो जाती है। 40 मीटर वाले डेढ़ मीटर वाले हिस्से में स्लाइडर लगाया जाता है। सामने की तरफ चीतलों के लिए दाना डाला जाता है। एक या दो दिन तक स्लाइडर बंद नहीं किए जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है जिससे की स्लाइडर बंद होने के बाद चीतल हड़बड़ा कर इधर- उधर न भागे। दाने को सकरे हिस्से तक डाला जाता है। धीरे - धीरे खाते- खाते चीतल वहां तक पहुंच जाते हैं।

इसके बाद सामने का स्लाइडर बंद कर दिया जाता है। इसके बाद चीतलों के लिए सकरे कॉरिडोर से आगे जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। जैसे ही इस कॉरिडोर को चीतल पार करते हैं यहां लगे स्लाइडर को बंद कर दिया जाता है। धीरे- धीरे चीतल आगे बढ़ता है और आगे रखे वाहन के पीछे हिस्से में पहुंच जाता है। यहां चीतलों के पहुंचते ही तीसरे स्लाइडर को बंद कर दिया जाता है। इसके बाद वाहन को उस स्थान पर ले जाते है जहां चीतलों को छोड़ना सुनिश्चित हुआ है।

छह साल पहले जुगाड़ की तकलीक से हुई थी शिफ्टिंग

बोमा तकनीक को अब जाकर स्थाई रूप से अपनाया जा रहा है। हालांकि इसी तकनीक से मिलती- जुलती जुगाड की तकनीक अपनाते हुए छह साल पहले कानन से 200 से अधिक चीतलों की टाइगर रिजर्व में शिफ्टिंग हुई थी। दोनों हरे नेट को घेरते हुए कॉरिडोर बनाया गया था। लेकिन वैकल्पिक होने के कारण भविष्य में दिक्कत आ सकती थी। इसे देखते हुए बाद में कानन पेंडारी जू प्रबंधन ने बजट स्वीकृत कराया और 30 मीटर लोहे का कॉरिडोर तैयार किया। यह स्थाई व्यवस्था है इससे चीतलों को कोई खतरा नहीं है।

ऐसे मिली थी जानकारी

2011 में कान्हा टाइगर रिजर्व में एक प्रशिक्षण आयोजित किया गया था। इसमें जिम्बाब्वे के विशेषज्ञों को बुलाया गया। इसमें शामिल होने के कारण कानन पेंडारी जू समेत रायपुर नंदन वन व छत्तीसगढ़ कुछ वन अफसरों को भेजा गया था। विशेषज्ञों ने इस बोमा तकनीक की जानकारी दी। यह कारगर साबित हुआ।
 

Source:Agency