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Date 22-02-18

सीपीएम में बहस : कोई बूझे कि मुद्दा क्या है?

By Mantralayanews :10-02-2018 08:27


22वीं पार्टी कांग्रेस में बहस के बाद निर्णय के लिए इस राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे को अंतिम रूप देने के क्रम में ही, कार्यनीति के सवाल पर कुछ मतभेद सामने आए हैं, जिन पर कोलकाता में जनवरी के मध्य में हुई केंद्रीय कमेटी की बैठक में, आम राय के बजाए बहुमत से निर्णय लेने की नौबत आयी है। अल्पमत की राय भी चूंकि केंद्रीय कमेटी के तिहाई से ज्यादा हिस्से की राय थी, स्वाभाविक रूप से यह बहस पूरी गंभीरता से पार्टी कांग्रेस में भी होगी। अंतिम रूप से पार्टी कांग्रेस ही संबंधित मुद्दों पर पार्टी का रुख तय करेगी। बहरहाल, मीडिया में आयी खबरों व टिप्पणियों से बनी आम धारणा के विपरीत, सी पी आई (एम) में कम से कम तीन मुद्दों पर पूर्ण सहमति है और इसलिए कोई बहस नहीं है।

देश की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी, सीपीएम में इस समय एक तीखी बहस छिड़ी हुई है। इस बहस में केंद्रीय सवाल यह है कि आज देश में सत्ता पर काबिज, भाजपा-आरएसएस जोड़ी का मुकाबला करने के लिए, सबसे उपयुक्त कार्यनीति क्या है? बेशक, यह बहस सिर्फ सीपीएम तथा वामपंथ तक ही सीमित नहीं है बल्कि आरएसएस से संचालित मौजूदा शासन का मुकाबला करने को जरूरी मानने वाली, देश की सभी राजनीतिक ताकतें भी किसी न किसी रूप में इस उधेड़-बुन में लगी हुई हैं। बार-बार उठने वाली विपक्षी एकता की पुकारें तथा प्रयास, इसी के सबूत हैं। फिर भी सीपीएम में यह बहस विशेष रूप से पार्टी की 22वीं कांग्रेस के संदर्भ में उठी है, जो इसी साल 18 से 22 अप्रैल तक हैदराबाद में होने जा रही है। 

    किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए, पार्टी कांग्रेस या महाधिवेशन ही सर्वोच्च नीति-निर्धारक निकाय होता है। अन्य राजनीतिक पार्टियों के विपरीत, कम्युनिस्ट पार्टी नेता या नेता समूह से नहीं, सुनिर्धारित नीति से चलती है। नेतृत्व अपनी मर्जी से नीति तय नहीं करता है बल्कि निर्धारित नीति का पालन सुनिश्चित करता है। हां! वह नीति निर्धारण का भी नेतृत्व जरूर करता है। यह नीति दो स्तर पर तय होती है। पहला, पार्टी कार्यक्रम, जिससे परिभाषित लक्ष्यों तथा बुनियादी नीति के आधार पर ही कम्युनिस्ट पार्टी गठित होती है। कार्यक्रम से पार्टी की बुनियादी दिशा या रणनीति तय होती है। नीति तय होने का दूसरा स्तर निश्चित अंतराल पर होने वाली पार्टी कांग्रेस का होता है, जिसमें दो पार्टी कांग्रेसों के बीच की अवधि के लिए, जाहिर है कि ठोस परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, अपेक्षाकृत तात्कालिक नीति या कार्यनीति तय की जाती है। सीपीएम की कांग्रेस सामान्यत: तीन साल के अंतराल पर होती है। याद रहे कि पार्टी कांग्रेस, सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं का जमावड़ा भर नहीं है। इसके पीछे मूल संकल्पना पार्टी की सामूहिक इच्छा की अभिव्यक्ति की है। 

इसीलिए, पार्टी कांग्रेस से पहले इकाई स्तर से लेकर राज्य स्तर तक, पार्टी सम्मेलनों की विस्तृत प्रक्रिया चलती है, जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधि हिस्सा लेते हैं और संगठन की अपने से ऊपर वाली मंजिल के सम्मेलनों के लिए  प्रतिनिधि चुनते हैं। इसी शृंखला की शीर्ष कड़ी के रूप में राज्य सम्मेलनों में कांग्रेस के लिए प्रतिनिधियों को चुना जाता है। यह पार्टी कांग्रेस को पार्टी का सर्वोच्च प्रतिनिधि निकाय बनाता है। इस पूरी प्रक्रिया में, पिछले सम्मेलन के बाद गुजरे अर्से के अनुभवों की रौशनी में पार्टी की रीति-नीति पर बहस होती है। और इस बहस के पूरक के रूप में, नीचे से ऊपर तक समूची पार्टी में उस राजनीतिक प्रस्ताव पर बहस की जाती है, जिस पर बहस कर पार्टी कांग्रेस में तीन साल के लिए पार्टी की रीति-नीति तय की जाती है। इस तरह, नीति तय करने में विचार और प्रतिनिधित्व, दोनों ही स्तरों पर समूची पार्टी की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है, जो महज चुनाव से कहीं गहरा जनतंत्र सुनिश्चित करती है। इसी तर्क से नीति तय हो जाने के बाद समूची पार्टी से, जिसमें कांग्रेस में चुना जाने वाला पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी शामिल है, उसके पालन की अपेक्षा की जाती है, जब तक कि अगली पार्टी कांग्रेस द्वारा पिछले अनुभव की समीक्षा कर, उसे बदल नहीं दिया जाता है।

22वीं पार्टी कांग्रेस में बहस के बाद निर्णय के लिए इस राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे को अंतिम रूप देने के क्रम में ही, कार्यनीति के सवाल पर कुछ मतभेद सामने आए हैं, जिन पर कोलकाता में जनवरी के मध्य में हुई केंद्रीय कमेटी की बैठक में, आम राय के बजाए बहुमत से निर्णय लेने की नौबत आयी है। अल्पमत की राय भी चूंकि केंद्रीय कमेटी के तिहाई से ज्यादा हिस्से की राय थी, स्वाभाविक रूप से यह बहस पूरी गंभीरता से पार्टी कांग्रेस में भी होगी। अंतिम रूप से पार्टी कांग्रेस ही संबंधित मुद्दों पर पार्टी का रुख तय करेगी। बहरहाल, मीडिया में आयी खबरों व टिप्पणियों से बनी आम धारणा के विपरीत, सी पी आई (एम) में कम से कम तीन मुद्दों पर पूर्ण सहमति है और इसलिए कोई बहस नहीं है।

 
पहला, फासिस्टी आरएसएस द्वारा संचालित और पूंजीपति-भूस्वामी वर्ग की पहली पसंद बन गयी भाजपा के राज और राजनीति से देश को मुक्ति दिलाना, आज का सबसे पहला राजनीतिक काम है। इसलिए, कांग्रेस समेत दूसरी किसी भी पार्टी को उसकी बराबरी पर रखे जाने या बराबर का शत्रु माने जाने का कोई सवाल ही नहीं है। दूसरा, न तो कांग्रेस समेत पूंजीवादी-भूस्वामी वर्ग की पार्टियों के साथ गठबंधन कर के जनता के सामने वास्तविक विकल्प पेश किया जा सकता है और न आज कांग्रेस और भाजपा दोनों से ही भिन्न, अन्य राजनीतिक ताकतों पर आधारित तीसरे विकल्प की ही कोई वास्तविक चुनावी संभावना है। तीसरा यह कि मौजूदा निजाम का वास्तविक, नीतिगत विकल्प, वामपंथी तथा जनतांत्रिक ताकतों की एकता ही खड़ा कर सकती है, जिसके लिए खुद सीपीएम को तथा वामपंथी एकता को मजबूत करने की और मेहनतकश जनता के संघर्षों को तेज करने तथा बहुत-बहुत व्यापक बनाने की जरूरत है।

सामान्यत: पार्टी कांग्रेस में पार्टी के लिए तीन साल के लिए तय की जाने वाली कार्यर्नीति में मध्यम अवधि की ऐसी ही कार्यनीति तय होती है और इस पर कोई मतभेद नहीं हैं। लेकिन, समस्या यह है कि सीपीएम की कांग्रेस के साल भर के अंदर ही 2019 के आम चुनाव होने हैं। इसलिए, पार्टी कांग्रेस द्वारा तय की जाने वाली मध्यम अवधि की कार्यनीति के साथ, फौरी चुनावी कार्यनीति के सवाल भी जुड़ गए हैं, जिनका पार्टी को जल्द ही सामना करना होगा।

मध्यम अवधि की कार्यनीति पर उक्त तीनों सहमतियों के दायरे में ही इस प्रश्न पर दो भिन्न रायें सामने आयी हैं कि वामपंथ के गढ़ों को छोड़कर, देश के अधिकांश हिस्से में जहां वामपंथ तथा उसके सहयोगी भाजपा-आरएसएस के लिए मुख्य चुनौती नहीं हैं, कौन सी कार्यनीति भाजपाविरोधी वोट की अधिकतम एकता के जरिए, उसकी चुनावी हार सुनिश्चित करने में ज्यादा मददगार होगी। बहस, ठीक इसी जगह पर है, जिसमें एक मत यह है कि भाजपाविरोधी वोट की अधिकतम एकता सुनिश्चित करने के लिए, चुनाव में कांग्रेस समेत अन्य धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के साथ, किसी गठबंधन या मोर्चे से भिन्न, सीमित तालमेल न सिर्फ जरूरी है बल्कि इससे जनता के बीच चुनाव में भाजपाविरोधी माहौल बनाने में यानी पार्टी के आज के मुख्य राजनीतिक लक्ष्य की ओर बढ़ने में भी मदद मिलेगी।

दूसरा मत यह है कि ऐसा तालमेल, खुद वामपंथ के लिए और एक वामपंथी तथा जनतांत्रिक वास्तविक विकल्प पेश करने के उसके अपेक्षाकृत दूरगामी प्रयासों के लिए नुकसानदेह होगा। केंद्रीय कमेटी के दो चक्र की बहस के बाद भी इस मुद्दे पर किसी सर्वानुमति पर न पहुंच पाने के बाद, अब अप्रैल में होने वाली पार्टी कांग्रेस ही तय करेगी कि सीपीएम इन दोनों में से किस मत पर चलेगी। फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि चूंकि यह बहस चुनावी कार्यनीति तक ही सीमित है जबकि पार्टी कांग्रेस अपेक्षाकृत मध्यम अवधि के लिए कार्यनीति तय करती है, ऐन मुमकिन है कि हैदराबाद में भी इस मुद्दे पर पार्टी की सोच का इशारा भर किया जाए और चुनावी कार्यनीति का विस्तृत निर्णय, उपयुक्त समय पर लिए जाने के लिए हैदराबाद में चुनी जाने वाली नयी केंद्रीय कमेटी पर छोड़ दिया जाए।
 

Source:Agency