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अमरीका-चीन ‘ट्रेड वार’ में किसकी विजय होगी

By Mantralayanews :10-04-2018 07:32


अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को किसी भी बड़ी या छोटी नीति की घोषणा करनी हो, निजी विचार प्रकट करने हों, यहां तक कि राजनयिक फैसलों की सूचना देने के लिए भी वह सबसे पहले ट्वीट करने के लिए जाने जाते हैं परंतु अब तक की अपनी सबसे आक्रामक आर्थिक नीति की घोषणा उन्होंने रेडियो पर की। घोषणा के बाद से ही इस नीति ने अमरीका ही नहीं, विश्व भर के वित्त बाजारों को हिला कर रख दिया है। 

डब्ल्यू.ए.बी.सी. रेडियो के ‘बर्नी एंड सिड मॉॄनग शो’ पर ट्रम्प ने चीन से आयातित 100 बिलियन डॉलर के उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की चेतावनी दी। इस कदम से अमरीका आने वाले चीनी उत्पादों पर लगने वाला आयात शुल्क तीन गुणा बढ़ सकता है। इससे सप्ताह भर पहले ही राष्ट्रपति ट्रम्प ने चीन से अमरीका आयात होने वाले 50 बिलियन डॉलर के उत्पादों पर शुल्क लगाने की घोषणा की थी। चीन के प्रति अपनी नीतियों के रुख पर बात करते हुए ट्रम्प ने कहा कि शुल्क लगाने से वित्तीय बाजारों को ‘नाममात्र दर्द’ झेलना होगा परंतु दीर्घकाल में इसका लाभ ही होगा। 

उन्होंने कहा, ‘‘आसान काम तो यही हो सकता है कि मैं आंखें मूंद कर इस मुद्दे को भूल जाऊं परंतु ऐसा करने का अर्थ होगा कि मैं अपना काम नहीं कर रहा हूं।’’ इसके जवाब में चीन ने भी तुरंत अमरीका से आयातित होने वाले 50 बिलियन डॉलर के उत्पादों पर आयात शुल्क जड़ दिया। चीन की ओर से इस बदले की कार्रवाई के बाद कृषि क्षेत्र तथा कानून निर्माताओं ने ट्रम्प की नीति का कड़ा विरोध शुरू कर दिया और वे वाशिंगटन पर अपने रुख को नर्म करने का दबाव डाल रहे हैं। इस मुद्दे पर चीन बिना किसी झिझक के पूरी ताकत से हमला करने के लिए तैयार है। चीनी वाणिज्य मंत्रालय के प्रवक्ता गाओ फेंग ने कहा है कि चीन अमरीका के कदम का उत्तर देने के लिए तैयार है जिसमें किसी तरह के विकल्प नहीं छोड़े जाएंगे। इनमें चीन में कार्यरत अमरीकी कम्पनियों पर लागू नियमों को सख्त करना भी शामिल है जिससे अमरीका के बड़े तथा अधिक महत्वपूर्ण वित्तीय बाजारों को बड़ा झटका लग सकता है जिनकी तुलना में चीन के वित्तीय बाजार छोटे हैं तथा बाकी दुनिया से उनका सम्पर्क भी सीमित है। 

अमरीका की ओर से चीन पर लगाए गए पहले शुल्कों में से एक स्टील तथा एल्यूमीनियम पर लगाया गया है। इसके बाद चीन ने दवाइयों, विमानों और सूत आदि पर शुल्क लगाया है। ध्यान रहे कि बोइंग जैसे विमान बनाने वाली अमरीकी कम्पनियां भी इसके तहत आती हैं। ट्रम्प की नई सख्त चीन नीति के पीछे रोबर्ट लाइटहाइजर का हाथ बताया जा रहा है जिनका मानना है कि अमरीका की तकनीक चुरा कर चीन अमरीका को 30 बिलियन डॉलर शुल्क की चपत लगा रहा है। माना जाता है कि चीन ने 1992 में बाजार आधारित सुधारों को लागू करने की सहमति दी थी परंतु अभी तक उसने ऐसा किया नहीं है। इस नीति का एक अन्य हिस्सा यह भी है कि अमरीका महसूस करता है कि रिसर्च पर करोड़ों-अरबों डॉलर खर्च करने वाली अमरीकी कम्पनियों को चीन में उत्पाद बेचने के लिए वहीं उत्पादन करने के लिए बाध्य करके वह अमेरिकी बौद्धिक सम्पदा अधिकारों का भी उल्लंघन कर रहा है। 

मुख्य रूप से चीन भविष्य में रोबोटिक्स, इलैक्ट्रिक कार्ज, आर्टीफिशियल इंटैलीजैंस में अग्रणी होने वाला है और यह सब टैक्नोलॉजी उसने अमरीकी कम्पनियों से ली है। ‘अमेरिका-चीन ट्रेड वार’ (व्यापार युद्ध) की अभी शुरूआत ही हुई है जो चीन को व्यापार के अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों का पालन करने के लिए बाध्य करने को अत्यावश्यक भी है परंतु इसमें विजेता वही होगा जो दिलेरी से अपने रुख पर टिका रहते हुए पहले कदम पीछे नहीं खींचेगा। हालांकि 1980 में अमरीका ने जापान से भी ऐसा ही व्यापार युद्ध लड़ा था जब जापान भी चीन की तरह अमरीकी टैक्नोलॉजी का अनुुचित लाभ उठा रहा था। उस समय अमरीका विजयी रहा था। आज यदि अमरीका पीछे हट जाता है तो अन्य कौन-सा देश ऐसा युद्ध लडऩे को आगे आएगा?
 

Source:Agency