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गरम मसाले से संरक्षित करते हैं संस्कृत की दुर्लभ पांडुलिपियां!

By Mantralayanews :16-04-2018 07:49


रायपुर । राजधानी में 1955 में बना सबसे पुराना संस्कृत महाविद्यालय असुविधाओं की मार झेल रहा है। यहां छात्रों को पढ़ने के लिए लाइब्रेरी की तो दी गई है, लेकिन न कोई उपयुक्त जर्नल है और न ही मैग्जीन मिल रही हैं। एक ओर जहां देशभर में डिजिटल टेक्नोलॉजी पर जोर दिया जा रहा है, वहीं महाविद्यालय की लाइब्रेरी में आज भी कागजों पर कार्य हो रहा है। लाइब्रेरी को डिजिटल करने की प्रक्रिया पांच माह पूर्व शुरू की गई, लेकिन आज तक कार्य पूरा नहीं हो पाया है।

कुछ माह पूर्व पांडुलिपियों को सुरक्षित करने के लिए कम्प्यूटर स्कैनिंग प्रारंभ की गई। वहीं पांच माह बीत जाने पर भी अब तक स्कैनिंग का कार्य पूरा नहीं हो पाया है। इन सब चीजों का खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है।

पत्रिकाओं का स्टैंड है खाली वहीं कॉलेज की छात्रों से बातचीत में उन्होनें बताया कि मैग्जीन का स्टैंड तो केवल नाम मात्र के लिए लगाया गया है। इसमें समय पर न तो कोई प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तिका होती है। न ही कोई रिसर्च बेस जर्नल पढ़ने को मिल पाता है।

दुर्लभ पांडुलिपि की सुरक्षा गरम मसाले से

दाह संस्कार, उदक शांति जैसे करीब 1039 दुर्लभ पांडुलिपि महाविद्यालय में हैं, लेकिन उन्हें सहेजने का कार्य नहीं हो रहा है। हर तीन माह में लिपियों पर दवाईयों का छिड़काव करने की प्रक्रिया है। वो भी पूरी नहीं हो रही है।

साहित्य और लिपियों की सुरक्षा महाविद्यालय प्रशासन गरम मसाले की पुड़ियों से कर रहा है। जो पूरी तरह से हास्यप्रद नजर आ रहा है। वहीं जब इस विषय में ग्रंथपाल से बात की गई तो उन्होंने बताया कि करीब नौ माह पूर्व अगस्त में दवाइयों का छिड़काव किया गया था। इन सब स्थितियों में हजारों वर्ष पूर्व संरक्षित पांडुलिपि केवल नष्ट होते दिखाई दे रही है।

- लाइब्रेरी को अपडेट किया जा रहा है, स्टाफ की कमी होने के पुस्तकों को कम्प्यूटर में अपडेट करने में समय लग रहा है। पांडुलिपियों को स्कैन करने का अंतिम दौर चल रहा है। जल्द ही सभी किताबें, पुराने साहित्य सभी तरह की सामग्री को कम्प्यूटर में डाल दिया जाएगा। - डॉ. सुनील कुमार सोनी लाइब्रेरियन, संस्कृत महाविद्यालय
 

Source:Agency