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इस सितम का अंत?

By Mantralayanews :06-06-2018 08:31


आज पेट्रोलियम मंत्री कह रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें सरकार के नियंत्रणाधीन नहीं हैं और उनकी कीमतों में इजाफे और डॉलर व रुपये की विनिमय दर में अंतर की वजह से समस्या खड़ी हुई है।' लेकिन 2013 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बहुत बढ़ गईं और पेट्रोल के दाम 76.06 रुपये लीटर तक पहुंच गये थे, तो तत्काालीन मनमोहन सरकार के दिये ऐसे ही तर्क उनकी भाजपाई जमात को स्वीकार नहीं थे। तब भाजपा ने नारा दिया था-'बहुत हुई जनता पर पेट्रोल-डीजल की मार, अबकी बार मोदी सरकार।Ó उसने इस नारे के पोस्टर पर अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की ऐसी तस्वीर लगायी थी, जिसकी मुद्रा देखकर लगता था कि यह शख्स सचमुच बदलाव करेगा।

अभी देश ईंधन-तेलों की कीमतों में लगी आग को लेकर रो ही रहा था कि तेल विपणन कम्पनियों ने रसोईगैस सिलेंडरों के दाम भी बढ़ा दिये हैं, जिसके बाद सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलेंडर 2.34 रुपये तो बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर 48 रुपये महंगे हो गये हैं। इससे क्षुब्ध लोग इन कम्पनियों की असंवेनशीलता को कोसते हुए उनकी ईस्ट इंडिया कम्पनी तक से तुलना कर रहे हैं। इन कम्पनियों ने जिस तरह लगातार सोलह दिनों तक अपने तेलों के दाम बढ़ाये, फिर पहले उनमें एक पैसे की, फिर पांच और सात पैसे की कमी कर उपभोक्ताओं के जख्मों पर नमक छिड़का और उनका मजाक उड़ाया, उससे उनके प्रति गुस्सा बहुत स्वाभाविक है। लेकिन याद रखना चाहिए कि ये वही कम्पनियां हैं, जिन्होंने कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान सरकार के इंगित मात्र पर 19 दिनों तक इन तेलों के दाम नहीं बढ़ाये। इसका अर्थ यही तो है कि मामले की असली खलनायक वह सरकार ही है, जिसने वोट लेना था तो इन कम्पनियों पर अंकुश रखा और अब न सिर्फ निरंकुश छोड़ दिया है, बल्कि उनकी करनी का बचाव करने में खुद भी हास्यास्पद हुई जा रही है।

आज पेट्रोलियम मंत्री कह रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें सरकार के नियंत्रणाधीन नहीं हैं और उनकी कीमतों में इजाफे और डॉलर व रुपये की विनिमय दर में अंतर की वजह से समस्या खड़ी हुई है।' लेकिन 2013 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बहुत बढ़ गईं और पेट्रोल के दाम 76.06 रुपये लीटर तक पहुंच गये थे, तो तत्काालीन मनमोहन सरकार के दिये ऐसे ही तर्क उनकी भाजपाई जमात को स्वीकार नहीं थे। तब भाजपा ने नारा दिया था-'बहुत हुई जनता पर पेट्रोल-डीजल की मार, अबकी बार मोदी सरकार।Ó उसने इस नारे के पोस्टर पर अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की ऐसी तस्वीर लगायी थी, जिसकी मुद्रा देखकर लगता था कि यह शख्स सचमुच बदलाव करेगा।

लेकिन अब? हालात गवाह हैं- उसकी सत्ता के चार सालों में कुछ बदला है तो यही कि वादे जुमलों में ढल गये हैं। तभी इस बाबत सवाल किये जाने पर बगलें झांकने और परस्परविरोधी बातें कहने की नौबत आ रही है। इन तेलों की महंगाई के मनमोहनकाल के बहानों में अमेरिका द्वारा ईरान पर प्रतिबंध के फैसले का सिर्फ एक ही नया कारण जुड़ा है। सो भी एक दिन में नहीं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी हलचल कई महीने पहले शुरू हो गई थी। फिर भी सरकार यह नहीं बता पा रही कि उसने उसके मद्देनजर तैयारी क्यों नहीं की? यह तो खैर वह बताने से रही कि जब तक कर्नाटक विधानसभा चुनाव का मतदान नहीं हुआ, इन तेलों के दाम क्यों नहीं बढ़े और अब जनता का बोझ नाकाबिल-ए-बर्दाश्त कर देने में जरा-सा भी संकोच क्यों नहीं हो रहा?

इस मुद्दे पर राज्य सरकारों की भूमिका को दोष देते हुए पेट्रोलियम मंत्री कहते हैं, 'पिछले दिनों केंद्र ने इन तेलों पर कर घटाया तो राज्यों ने उस अनुपात में उनमें कमी नहीं की। हम क्या करें, उन पर दबाव नहीं डाल सकते, केवल अनुरोध कर सकते हैं। फिर भी सरकार तेलों की कीमतों को लेकर गम्भीर है और उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए जल्द ही कोई हल निकालेगी।'

लेकिन उनके कहे पर किसी को एतबार हो तो कैसे? वे पिछले साल सितंबर से, जब मोदी राज में पेट्रोल के दाम पहली बार 70 रुपये के पार पहुंचे थे, यही कहते आ रहे हैं। अलबत्ता, तब उन्होंने टका-सा जवाब देते हुए कह दिया था कि सरकार तेल कंपनियों द्वारा पेट्रोल-डीजल की कीमतें तय करने से संबंधित अपनी नीति में बदलाव नहीं करेगी और अब कह रहे हैं कि कोई हल निकालेंगे। लेकिन अभी तक किसी को नहीं मालूम कि वह हल क्या है या क्या हो सकता है और कब तक हो जायेगा।

तिस पर शातिराना देखिये- अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार के उतार-चढ़ाव, राज्यों के असहयोग और तेल निर्यातक देशों की 'मनमानी' की आड़ लेते हुए वे यह तो कहते हैं कि तेल के दामों को जीएसटी के तहत लाया जाए तो ग्राहकों को राहत मिल सकती है, लेकिन इस सवाल का जवाब नहीं देते कि फिर सरकार समस्या का कोई और हल क्यों तलाश रही है? फौरन से पेश्तर उनको जीएसटी के तहत लाती क्यों नहीं है? यह क्यों कहती है कि इसके लिए राज्यों पर दबाव नहीं डाल सकती? समझना चाहिए कि अगर उसकी यह 'बेचारगी' इसलिए है कि अब देश के अधिकतर राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगियों की ही सरकारें हैं, तो यह बेचारगी से ज्यादा चालाकी है। वरना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या उनकी सरकार जनता के हितसाधन हेतु अपनों पर दबाव क्यों नहीं डाल सकती?

फिर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने हाल ही में जिस तरह तेल के दामों को जीएसटी के तहत लाने की वकालत की थी, उससे लगता है कि बात दबाव डाले जाने की न होकर कुछ और है, जिसे जानबूझकर छिपाया जा रहा है। इस छिपाने के ही चक्कर में एक ओर कहा जा रहा है कि सरकार के हाथ में कुछ है ही नहीं और दूसरी ओर जीएसटी के दायरे में लाने या कोई और हल तलाशने की बात कही जा रही है। जानकारों की मानें तो पेट्रोलियम मंत्री ने जीएसटी को इस मुद्दे से जुड़े सवालों से बचने का बहाना बना लिया है। विडम्बना यह भी कि एक ओर पेट्रोलियम मंत्री लोगों को राहत देने के लिए कुछ न कुछ करने की बात कह रहे हैं तो दूसरी ओर कानूनमंत्री संकेत दे रहे हैं कि तेल के दाम में बढ़ोतरी सही है और ये कम नहीं होने वाली।

केंद्रीय मंत्री के. अल्फोन्स का पिछले सितंबर का वह असंवेदनशील बयान तो लोगों को अभी भी याद ही है, जिसमें उन्होंने कहा था कि 'लोग अगर कार-बाइक लेते हैं तो उन्हें चलाने के लिए पेट्रोल भी खरीदना होगा. आखिरकार, गाड़ियां खरीदने वाले भूखे नहीं मर रहे।'

इस असंवेदनशीलता का सबसे ताजा सच यह है कि जीएसटी के तहत इन तेलों पर ज्यादा से ज्यादा 28 प्रतिशत कर लगाया जा सकता है और अभी उन पर अस्सी प्रतिशत से ज्यादा कर लग रहा है। अलग-अलग शहरों में उनकी कीमतें इसलिए अलग-अलग हैं, क्योंकि अलग-अलग राज्य उनपर अपनी जरूरत के अनुसार अलग-अलग कर लगाते हैं। उनके दामों को जीएसटी के तहत लाने से संभावित राजस्व का बड़ा नुकसान उठाने के मूड में न तो केंद्र है और न ही राज्य। सो, सरकार द्वारा इधर-उधर की बातें करते हुए मनौतियां मानी जा रही हंै कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम घटें, ग्राहकों को राहत मिले और उसे आलोचनाओं से छुटकारा। लेकिन तथ्य हैं कि इन मनौतियों को भी पलीता लगाने पर तुले हैं। कच्चे तेल के दाम पिछले दिनों कुछ गिरे और डालर के मुकाबले रुपया 1.5 प्रतिशत मजबूत हुआ। फिर भी तेल कंपनियां कीमतों में एक और पांच-सात पैसे की कटौती कर ग्राहकों का मजाक बनाने से आगे नहीं बढ़ रहीं। 

Source:Agency