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गुस्ताखी माफ हो

By Mantralayanews :03-07-2018 05:55


लोकतंत्र में राजतंत्र की घुसपैठ किस तरह से करवाई जा सकती है, इसकी मिसाल जनता दरबार जैसे आयोजनों में देखी जा सकती है। दरबार शब्द किसी नजरिए से लोकतांत्रिक शब्द नहीं है, इससे राजशाही की बू आती है। शपथग्रहण समारोह को भी अक्सर ताजपोशी जैसे विशेषण दे दिए जाते हैं। ताज या मुकुट पहनना या दरबार सजा कर उसमें फरियादियों को खड़ा करना तो सामंती, राजतंत्र के युग में होता था। 70 साल पहले आजाद हुए भारत में तो लोकतंत्र कायम है और यही कायम रहना चाहिए, तभी भारत बच पाएगा। लेकिन अफसोस इस बात का है कि हमारे अधिकतर नेताओं के मिजाज सत्ता में आते ही राजा की तरह हो जाते हैं। अपने शाही मिजाज में नेता, मंत्री कभी अफसरों से जूते उठवाते हैं, कभी उनके कंधों पर सवार होकर पानी से भरा रास्ता पार करते हैं, और कभी सरेआम पैर पड़वाते हैं।

राजशाही की यह मानसिकता और सत्ता के रौब की एक बानगी पिछले दिनों उत्तराखंड में देखने मिली। जहां मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने जनता दरबार लगाया था। एक ओर मुख्यमंत्री अपने कारिन्दो के साथ थे और दूसरी ओर कुछ दूरी पर फरियादी जनता। मुख्यमंत्री के सिर पर सोने का मुकुट और अगल-बगल पंखा झुलाते सेवक नहीं खड़े थे, बाकी सारा नजारा दरबार जैसा ही था। यहां एक शिक्षिका ने अपने तबादले की मांग मुख्यमंत्री के सामने रखी। 57 बरस की उत्तरा बहुगुणा उत्तरकाशी के नौगांव क्षेत्र के प्राइमरी स्कूल में प्रिंसिपल हैं, लगभग 25 वर्ष से वे यहां पदस्थ हैं। वे कई वर्षों से देहरादून तबादले की गुहार लगाती रही हैं, क्योंकि उनके बच्चे देहरादून में हैं। 2015 में उनके पति की भी मौत हो गई।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2017 के अपने एक आदेश में कहा है कि विशेष परिस्थितियों में शिक्षिकाओं का तबादला उनके पति के गृहजिले में किया जा सकता है। मानवीय आधार भी यही है किपति की मौत के बाद पत्नी को उसके बच्चों के पास रहकर काम करने की अनुमति दी जाए। लेकिन भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री रावत को शायद सत्ता के अहंकार में किसी विधवा कर्मचारी की पीड़ा दिखाई नहींदी। उन्हें दिखाई दी केवल उत्तरा बहुगुणा की बेअदबी। दरअसल कई बरसों से शिक्षा विभाग के अधिकारियों से तबादले की गुहार लगाते-लगाते उत्तरा बहुगुणा इतनी कुंठित हो गईं कि उन्होंने मुख्यमंत्री के सामने तल्ख लहजे में अपने तबादले की मांग रखी। उनका यह रवैया शहंशाह त्रिवेन्द्र सिंह रावत को नागवार गुजरा।

आखिर जनता दरबार था, कोई लोकतांत्रिक आयोजन नहीं कि जनता खुलकर अपनी बात रख सके। हो सकता है उत्तरा मुख्यमंत्री के पैरों पर गिरतीं, अपने अधिकार को भीख में मांगती और अपनी बात कहने से पहले गुस्ताखी माफ हो हुजूर कहतीं तो रावत जी का अहम शांत होता और वे उनका तबादला भी कर देते। लेकिन यहां तो उत्तरा ने मुख्यमंत्री के सामने बिना डरे अपनी बात रखी, बस इस पर वे इतना भड़क उठे कि न केवल उत्तरा के निलंबन का आदेश दिया, बल्कि हिरासत में भी लेने कह दिया। हालांकि मामले का वीडियो वायरल हुआ तो भाजपा सरकार को समझ में आया कि यह अहंकार उल्टा पड़ सकता है, तो शाम तक उत्तरा की रिहाई भी हो गई। अब शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे उत्तरा बहुगुणा से माफी मांग कर समस्या के समाधान की बात कह रहे हैं, लेकिन उत्तरा का कहना है कि जब अपमान मुख्यमंत्री ने किया है, तो माफी भी उन्हें ही मांगनी चाहिए। फिलहाल ऐसा लगता तो नहीं कि एक अदना सी शिक्षिका के आगे सत्ता का अहंकार झुकेगा, लेकिन इस प्रकरण से कुछ सवाल जरूर पैदा हो गए हैं। 

उत्तरा बहुगुणा के तबादले की बात निकली तो बात मुख्यमंत्री की शिक्षिका पत्नी तक भी पहुंची और आरटीआई में खुलासा हुआ है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत की पत्नी सुनीता यादव की बतौर शिक्षिता पहली पोस्टिंग 24 मार्च 1992 को प्राथमिक विद्यालय कफल्डी स्वीत पौड़ी गढ़वाल में हुई थी, इसके बाद 27 अगस्त 1996 को वे देहरादून के अजबपुर कलां के एक स्कूल में तबादले पर आईं और तब से अब तक यहीं हैं। इस दौरान उन्हें 2008 में पदोन्नति भी मिली, लेकिन तब भी उनका तबादला किसी और जिले में नहीं किया गया। प्राथमिक स्कूल की दो शिक्षिकाओं की नियुक्ति और तबादले में यह फर्क क्यों है?

सवाल यह भी है कि बहुगुणा को कर्मचारी आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में शिक्षाा विभाग ने सस्पेंड किया था, तो अब शिक्षा मंत्री की माफी के बाद यह आरोप उन पर से हट जाएगा? अभी कुछ दिन पहले तबादले की सिफारिश न मानने पर राजस्थान में चिकित्सा राज्य मंत्री बंशीधर बाजिया और शिक्षा राज्य मंत्री वासुदेव देवनानी के बीच मारपीट हुई, तो इन मंत्रियों को सरकारी काम काज में दखल या भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार क्यों नहीं किया जाता? सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या उत्तरा बहुगुणा की नौकरी बहाली या मंत्री के माफी मांगने से उनका आत्मसम्मान लौटाया जा सकता है? क्या आरएसएस के संस्कारों में महिलाओं से व्यवहार का संस्कार मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने नहीं सीखा? 
 

Source:Agency