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थोड़ा और डराने की कोशिश

By Mantralayanews :09-07-2018 08:14


देश में कमजोर, अल्पसंख्यकों, दलितों का एक बड़ा तबका लगातार खौफ के साए में जी रहा है। उनके खान-पान, पहनावे, शिक्षा, परंपराओं हर किसी पर टेढ़ी नजर रखी जा रही है। देश के स्वघोषित ठेकेदार इन लोगों पर जब-तब हमले बोल रहे हैं, ताकि इन्हें यह अहसास कराया जा सके कि इस देश पर उनका हक बराबरी का नहीं है। संविधान ने भले समानता का अधिकार दिया हो, लेकिन देश अगर संविधान के हिसाब से चलेगा तो धर्म और जात-पात के नाम पर डराने का धंधा खत्म हो जाएगा। और बहुत से राजनीतिक दलों की पूछ-परख भी। इसलिए अल्पसंख्यकों और दलितों को दबाकर रखना और उन्हें लगातार डराते रहना जरूरी हो गया है।

केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा की तथाकथित गौरक्षकों के साथ हंसती-मुस्कुराती तस्वीर डराने की रणनीति का ही हिस्सा लगती है। पिछले साल जून में झारखंड के रामगढ़ में मांस कारोबारी अलीमुद्दीन अंसारी की कथित तौर पर गोमांस ले जाने के शक में पीट-पीटकर हत्या कर दी गयी थी। इस मामले में मार्च में स्थानीय अदालत ने 11 आरोपी 'गो-रक्षकों' को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस के बाद स्थानीय भाजपा नेता इनके समर्थन में खुलकर सामने आये थे और भाजपा के कई स्थानीय नेताओं और संगठनों ने आंदोलन छेड़ दिया था। अभी 30 जून को इनमें से 8 दोषियों को झारखंड हाईकोर्ट से जमानत मिली है। इन अभियुक्तों में एक स्थानीय भाजपा नेता नित्यानंद महतो समेत अन्य सात लोग हैं। खबरों के मुताबिक बुधवार को जब ये आरोपी हजारीबाग की जय प्रकाश नारायण सेंट्रल जेल से बाहर निकले तो इनका स्वागत करने केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा पहुंचे।

हजारीबाग से सांसद जयंत सिन्हा ने इन्हें फूलमालाएं और मिठाई दीं, इनके साथ फोटो भी खिंचवाई। इससे पहले 30 जून को भाजपा के पूर्व विधायक शंकर लाल चौधरी ने तो खुशी जताते हुए अभियुक्तों के परिजनों को मिठाई बांटी थी और कहा था कि इन सभी लोगों को जमानत मिल जाने के बाद शहर में विजय जुलूस निकाला जाएगा। फिलहाल जयंत सिन्हा के इन आरोपियों के साथ फोटो खिंचाने पर ही सवाल उठ रहे हैं, तो अब इसकी उम्मीद कम है कि अगर कोई विजय जुलूस निकला तो वे उसमें शामिल होंगे। लेकिन ऐसे गोरक्षक, जिन पर किसी की हत्या का आरोप है, उनके साथ फोटो खिंचाने के पीछे जयंत सिन्हा का उद्देश्य आखिर क्या था, यह सवाल बार-बार उठ रहा है। जयंत सिन्हा ने इस मामले पर ट्वीट किया कि मैं स्पष्ट रूप से हर तरह की हिंसा की निंदा करता हूं।

संविधान के आधार पर चलने वाले हमारे लोकतंत्र में $कानून सर्वोपरि है। किसी भी तरह के गैर$कानूनी काम जो किसी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। श्री सिन्हा के इस ट्वीट का क्या अर्थ निकाला जाए?  वे हार्वर्ड से पढ़े हैं और सरकार में जिम्मेदार पद पर हैं, वे जो कहेंगे, सच ही कहेंगे, सच के सिवा कुछ नहीं कहेंगे। लेकिन वे यह तो बता दें कि वे केवल हिंसा की निंदा करते हैं, या हिंसा करने वालों के भी खिलाफ हैं? उन्हें कानून पर पूरा भरोसा है, तो उन लोगों को फूलमालाएं पहनाने की क्या जरूरत, जो अभी हत्या के आरोपी हैं। क्या श्री सिन्हा ने एक पल के लिए भी सोचा कि गोरक्षा के नाम पर मार दिए गए अलीमुद्दीन के घरवालों पर यह फोटो देखकर क्या बीतेगी? और अलीमुद्दीन ही क्यों अखलाक, जुनैद, पहलू खां जैसे तमाम लोगों के परिजन इस तस्वीर को देखकर थोड़ा और सिहर गए होंंगे। उनके कभी न भरने वाले जख्मों पर फिर से नमक छिड़क दिया गया है।

 अलीमुद्दीन की बेटी शमा परवीन का कहना है कि सरे आम किसी अपराधी को फूलों की माला पहनाकर बहुत ही गंदा संदेश दिया जा रहा है, बताया जा रहा है कि देखो - हम मारेंगे, हम काटेंगे भी और फिर हम बाद में मारने वाले का फूलों से स्वागत भी करेंगे। जिसका घर उजड़ गया, उसका कोई ध्यान नहीं है लेकिन जिसने घर उजाड़ा है, उसका दिल से स्वागत करेंगे, सरेआम, बीच सड़क, बीच राह पर। इन शब्दों में पीड़ित परिवार का सारा दर्द एक बार फिर से उभर कर सामने आया है। लेकिन भाजपा सरकार के पास इन शब्दों को पढऩे, इस दर्द को समझने की फुर्सत कहां है। जयंत सिन्हा झारखंड में हत्या के आरोपियों से मिले, तो  बिहार में गिरिराज सिंह जेल में दंगे के आरोपियों से मिले। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने शासन की उपलब्धियां गिनाने और कांग्रेस के लिए नए-नए विशेषण गढ़ने में मशगूल हैं, ऐसी मेल-मुलाकातों पर वे कभी कुछ नहींबोलते। क्या उनकी चुप्पी को उनका समर्थन माना जाए? 
 

Source:Agency