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पुराने भारत को खत्म करके बनेगा न्यू इंडिया?

By Mantralayanews :18-08-2018 09:12


पिछले 4 सालों से प्रधानमंत्री मोदी यूपीए सरकार को कोसते आये हैं, और लालकिले से अपने इस कार्यकाल के अंतिम सम्बोधन में भी उन्होंने यही किया। 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले के इस सम्बोधन में मोदीजी ने चुनावी बिसात बिछा दी। एक ओर उन्होंने अपनी सरकार के लिए सौ में एक सौ दस अंकों जैसा रिपोर्ट कार्ड पेश किया तो दूसरी ओर फिर कुछ लुभावने वादे, रंगीन सपने दिखाए। जैसे उन्होंने देश को खुशखबरी दी कि 2022 तक मां भारती की कोई संतान, चाहे बेटा हो या बेटी, अंतरिक्ष में जाएगी। खबरों के मुताबिक, इस मिशन के लिए इसरो कड़े प्रयास कर रहा है। लेकिन मोदीजी ने कुछ इस अंदाज में यह घोषणा की मानो उनकी सरकार कल की किसी को अंतरिक्ष भेज रही है और ऐसा करते हुए उन्होंने नेहरूजी को याद करना बिल्कुल जरूरी नहीं समझा, जिनके प्रयासों से इसरो जैसे संस्थान देश में खड़े हुए।

उन्होंने 25 सितम्बर, पंडित दीन दयाल की जयंती से प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना शुरू करने की घोषणा की और इस तरह एक बार फिर गरीबों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का सपना दिखाया। हालांकि इस बारे में बजट में भी घोषणा थी और तब से इसका खूब प्रचार भी हुआ है। लेकिन दूसरी ओर सरकारी स्वास्थ्य केेंद्रों, अस्पतालों की जो बदहाली है, डाक्टरों की कमी है, उस पर वे कुछ नहीं कहते। सेना में महिला अधिकारियों को भी स्थायी कमिशन देने की घोषणा करने के साथ-साथ मोदीजी ने नारी शक्ति का गुणगान किया और लगे हाथों रेप जैसी गंभीर आपराधिक समस्या को राक्षसी मनोवृत्ति बताते हुए कहा कि इससे देश को मुक्त कराना होगा। लेकिन देश को यह भी जानना था कि कठुआ के बाद मुजफ्फरपुर और देवरिया में जो राक्षसी व्यवहार हुआ है, उस पर वे और उनकी सरकार क्या कहती है। 

80 मिनट के भाषण में मोदीजी गाँव, गरीब, महिलाओं पर केंद्रित बातें करते रहे। एक लोककल्याणकारी सरकार का मुखिया होने के नाते उन्हें सच में ऐसे ही वंचित, शोषित तबकों पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन क्या केवल बातों से, या पिछली सरकार की बुराई से हाशिए पर खड़े लोग मुख्यधारा में आ जाएंगे। मोदीजी ने बेचैन, व्यग्र, अधीर जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए बताना चाहा कि देश को बदलने की कितनी चाह उनमें हैं। लेकिन यह बेचैनी, व्यग्रता, अधीरता तब नजर क्यों नहीं आती, जब देश का संïवैधानिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक उदारता वाला ढांचा चरमराता है? न्यू इंडिया क्या पुराने भारत को बर्बाद करके ही बनेगा? खुशहाल भारत की राजधानी में भूख से तड़पती बच्चियों की मौत तो न्यू इंडिया का पैमाना नहीं हो सकता।

पुराने भारत में भले अरबपतियों की संख्या कम थी, लेकिन आम आदमी के लिए जीवन आसान था। विकास की अंधी दौड़ नहीं थी और सचमुच सब लोग साथ में आगे बढ़ रहे थे। धर्म और जाति को लेकर इतना दुराव पहले नहीं था। अफवाहें पहले भी फैलती थीं, लेकिन भीड़ के लिए हत्या का हथियार इस तरह से नहीं बनती थीं। पड़ोसी देशों से संबंधों में नरमी-गरमी चलती रहती थी, लेकिन सीमा पर आज युद्धकाल से भी ज्यादा सैनिक शहीद हो रहे हैं, ऐसा पहले तो नहीं था। डिजीटल इंडिया के शोर में आम आदमी की निजता दांव पर लग चुकी है। देश कई गंभीर सवालों से दो-चार हो रहा है, लेकिन जवाबदेह लोग संसद में बोलना नहीं चाहते।

और बोलते हैं तो बात विपक्ष पर निजी हमलों तकपहुंच जाती है। क्या इस तरह का न्यू इंडिया बनाना चाहते हैं, मोदीजी? अटकने, लटकने और भटकने की लच्छेदार और जुमलोंनुमा बातें देश चार सालों से सुन रहा है, अब देश असल परिणाम देखना चाहता है। और ऐसी बातें सुनना चाहता है, जिसमें उसके सवालों के, उलझनों के जवाब मिले। क्या मोदीजी ऐसी बातें बोलना पसंद करेंगे? 
 

Source:Agency