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अनुशासन और असहमति का फर्क

By Mantralayanews :04-09-2018 09:11


संघ अपनी कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा के साथ-साथ अनुशासन के लिए भी जाना जाता है। संघ के पथसंचालन या अन्य आयोजनों में उसके कार्यकर्ताओं का अनुशासन देखते ही बनता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी संघ की शिक्षा-दीक्षा में रचे-पगे हैं, इसलिए उनमें भी अनुशासन कूट-कूट कर भरा है। लेकिन देश में इस वक्त संघतंत्र नहीं लोकतंत्र ही कायम है। इस लोकतंत्र के तहत ही नरेन्द्र मोदी भी चुनाव जीतकर संसद तक और फिर प्रधानमंत्री की आसंदी तक पहुंचे हैं। लोकतंत्र में अनुशासन का महत्व होता है, लेकिन असहमति का भी उतना ही महत्व होता है। बल्कि असहमति के लिए स्थान न हो, तो लोकतंत्र कायम ही नहीं रह सकता। यह बात नरेन्द्र मोदी को हमेशा याद रखनी चाहिए। एक और बात पर ध्यान देना जरूरी है कि अनुशासन और तानाशाही के बीच एक महीन रेखा होती है, जिसे संभालना जरूरी होता है।

इस रेखा के जरा आर-पार होने से तानाशाही प्रवृत्ति के हावी होने का खतरा बढ़ जाता है। सदियों पुरानी बात नहीं है, अभी पिछली सदी में ही दुनिया ने बेहद अनुशासित हिटलर और उसकी उतनी ही अनुशासित सेना और समर्थकों को देखा है और यह भी देखा है कि किस तरह इन लोगों ने दुनिया को दूसरे विश्वयुद्ध में धकेला, किस तरह का नरसंहार किया। कोई दो दशक पहले शेखर कपूर ने मि.इंडिया फिल्म बनाई थी, जिसमें मोगैंबो नामक का भयावह किरदार था। मोगैंबो अपना दबदबा और अनुशासन दिखाने के लिए अपने तीन सिपाहियों को तेजाब के कुंड में कूदने कहता है और वे तीनों - हे मोगैंबो, बोलकर कूद भी जाते हैं। किसी के लिए अपना समर्पण दिखाने के लिए एक इशारे पर जान देना भी अनुशासन ही माना गया। इससे मोगैंबो तो खुश हो सकता है, लेकिन उसके आतंक का खतरा और बढ़ जाता है।

लोकतंत्र में यह खतरा न आए, इसके लिए जरूरी है कि तेजाब कुंड में कूदने से मना करने की हिम्मत हो। अगर अनुशासन का मतलब कभी विरोध के स्वर न उठाना हो, तो फिर ऐसे अनुशासन से लोकतंत्र नहीं बच सकता। यह सारी बात इसलिए कही जा रही है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि अनुशासन की बात कीजिए तो आजकल आपको अलोकतांत्रिक, तानाशाह भी कह दिया जाता है।

उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू की किताब मूविंग ऑन मूविंग फॉरवर्ड:ए इयर इन ऑफिस के विमोचन के अवसर पर मोदीजी ने ये बात कही। वे सभा को बतला रहे थे कि सदन में किस तरह श्री नायडू चर्चा के दौरान अनुशासन बनाए रखने के प्रयास करते हैं, हंगामा करने वालों को रोकते हैं और इसी क्रम में उन्होंंने इशारों में कांग्रेस पर तंज कसते हुए अनुशासन और तानाशाही वाली बात कही।

नरेन्द्र मोदी की कोई भी बात या भाषण कांग्रेस पर कटाक्ष किए बिना पूरी नहीं होती, सो इस किताब विमोचन के मौके पर भी उन्होंने यही किया। हालांकि जब वे ये बात कह रहे थे, तब मंच पर पूर्व प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह भी मौजूद थे। जिनके लिए उन्होंने सदन में यह निम्नस्तरीय टिप्पणी की थी कि वे बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाते हैं। इस तरह की कटुक्तियों पर शायद संघ के अनुशासन की कोई पाबंदी नहीं है। अभी दो-तीन दिन पहले ही केन्द्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की तुलना नाली के कीड़े से की, जबकि नरेन्द्र मोदी को आकाश बताया। अपने नेता की चाटुकारिता करना और विरोधी के लिए अपशब्द कहने पर भी शायद कोई अनुशासन या शिष्टाचार लागू नहीं होता है। मोदीजी ने अब तक अश्विनी चौबे के इस बयान पर कोई टिप्पणी नहीं की यानी इसे उनका मौन समर्थन ही समझना चाहिए। 

देश भर में धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर जो गुंडागर्दी चल रही है, भीड़ की हिंसा काबू में ही नहीं आ रही है, गाय की रक्षा के नाम पर निर्दोषों के साथ जानलेवा हिंसा हो रही है, वह सब भी शायद संघ, भाजपा और मोदीजी की नजर में अनुशासन ही है, इसलिए उसे रोकने के लिए जुबानी जमाखर्च से ज्यादा कुछ नहीं किया जा रहा। लेकिन अगर सरकार या भाजपा के खिलाफ कोई कुछ कहे तो फौरन अनुशासन याद आ जाता है। श्रीमान 70 सालों में यह देश दक्षिणपंथी, वामपंथी, मध्यममार्गी सब को साथ लेकर ही आगे बढ़ा है। अगर अनुशासन के नाम पर असहमति के स्वरों को दबा दिया जाता तो न लोकतंत्र बचता, न यह देश। 
 

Source:Agency