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सेना को मजबूत क्यों नहीं बनाती सरकार

By Mantralayanews :25-09-2018 07:10


रक्षा मामलों की संसदीय समिति के अध्यक्ष पद से रिटा मे.ज.बी.सी. खंडूरी को हटाकर कलराज मिश्र को उनकी जगह अध्यक्ष बना दिया गया है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री कलराज मिश्र ने पिछले साल सितंबर में ही मंत्री पद छोड़ा था, क्योंकि उन्होंने 75 बरस की उम्र पार कर ली थी और मोदीजी सार्वजनिक पदों पर 75 बरस से अधिक के लोगों को रखने के हिमायती नहीं हैं। पर अब फिर से श्री मिश्र को इस पद पर क्यों बिठाया गया, यह सवाल उठेगा ही। लेकिन उससे भी पहले सवाल यह है कि बी.सी.खंडूरी को अचानक क्यों हटाया गया।

आम तौर पर रिवाज यही है कि संसदीय समिति के अध्यक्ष पद से कोई तभी हटता है, जब लोकसभा कार्यकाल समाप्त हो चुका हो, या उस सांसद को मंत्री बनाया गया हो या वे पार्टी से निकाल दिए गए हों या स्वेच्छा से उन्होंंने पद छोड़ा हो। जन.बी.सी.खंडूरी के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं था। फिर उन्हें अचानक हटाने का फैसला क्या इसलिए लिया गया कि रक्षा मामलों पर उनकी रिपोर्ट से सरकार के लिए असुविधा खड़ी हो रही थी? गौरतलब है कि इस साल मार्च में संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें कहा गया था कि रक्षा मंत्रालय को इतना कम पैसा दिया जा रहा है कि वह अनिवार्य जरूरतों को मुश्किल से पूरा कर पा रही है। समिति ने तत्कालीन उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल सरथ चंद द्वारा बताए गए तथ्यों के मुताबिक रिपोर्ट तैयार की थी।

लेफ्टिनेंट जनरल सरथ चंद ने नई खरीद नीति पर बात करते हुए कहा था कि 2018-19 के बजट ने हमारी उम्मीदों को धराशायी कर दिया है और जो कुछ भी अब तक हमारे द्वारा हासिल किया गया है, यह उसके लिए झटका है। क्षेत्रीय सुरक्षा पर बात करते हुए उप सेना प्रमुख ने कहा था कि दो मोर्चों पर युद्ध की संभावना एक सच्चाई है और देश को सेना के आधुनिकीकरण पर ध्यान देने की जरूरत है। सेना ने समिति को यह भी सूचना दी कि उसके पास चीन-भारत सीमा के पास सामरिक सड़कों के निर्माण के लिए भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। उप सेना प्रमुख ने जम्मू में उरी, पठानकोट, नागरोटा और सुजवां कैंट में सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सुरक्षा बलों को उनका बकाया मिलना चाहिए।

जनरल खंडूरी की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट थी कि सेना को आधुनिक बनाने के लिए 21,338 करोड़ दिया गया है जो कि बहुत कम है, सेना के जो 125 प्रोजेक्ट चल रहे हैं उन्हीं पर 29,033 करोड़ का खर्च होना है। उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल सरथ चंद ने समिति से कहा था कि धन के अपर्याप्त आवंटन से सेना की आधुनिकीकरण की योजना प्रभावित होगी जबकि दूसरी ओर चीनी सेना अमेरिकी सेना के स्तर तक पहुंचने का प्रयास कर रही है। उन्होंने यह भी कहा था कि सेना के 68 प्रतिशत हथियार 'विंटेज श्रेणी' यानी संग्रहालय में रखने लायक हैं और फंड का अभाव मौजूदा साजो-सामान के रखरखाव और कार्यशीलता पर तो प्रभाव डालेगा ही, साथ ही पुरानी खरीदों की किश्तों के भुगतान को भी प्रभावित कर सकता है।

रक्षा समिति ने इन सारी बातों को सरकार के सामने रखा और रोष जताया। लेकिन जून में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से जब एक प्रेस कांफ्रेंस में इस बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने रक्षा में बजट की कमी को सिरे से नकार दिया। उन्होंने कहा कि सेना के सभी तीनों अंगों को पर्याप्त बजट दिया जा रहा है और हथियारों की भी कोई कमी नहीं है। उन्होंंने यह भी कहा था कि सशस्त्र बलों को अपनी मांगों, जरूरतों पर पुनर्विचार करना चाहिए। नई तकनीकी के कारण बहुत से उपकरणों की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, जिसकी मांग सेना कर रही है। इस तरह एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी, उपसेना प्रमुख और सेना की बातों को रक्षा मंत्री ने एकदम खारिज कर दिया, बल्कि यह भी बता दिया कि सैन्य, रक्षा खर्च में कहीं कोई कटौती नहीं हो रही है। 

मोदी सरकार की खासियत ही यही है कि प्रधानमंत्री से लेकर तमाम मंत्री अपने को हर बात का विशेषज्ञ मानते हैं और चाहते हैं कि हर कोई उनकी बात चुपचाप मान ले, सवाल न उठाए। लेकिन बी.सी.खंडूरी ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने रक्षा मामलों की संसदीय समिति का अध्यक्ष होने के नाते वास्तविकता सरकार के सामने रखी। यही बात सरकार को शायद खटक गई। देश की सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाली, सैनिकों की शहादत पर वीररस के गीत गाने वाली, सर्जिकल स्ट्राइक डे का राजनीतिकरण करने वाली सरकार सेना को मजबूत बनाने के लिए क्या कर रही है? उसकी जरूरतों को पूरा क्यों नहीं कर रही? पुराने हथियारों की जगह आधुनिक हथियार क्यों नहीं ला रही? ऐसे तमाम सवाल 56 इंच के सीने वाली सरकार से किए जाने चाहिए, लेकिन करेगा कौन, यही बड़ा सवाल है।
 

Source:Agency