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कभी गढ़ रहे छत्तीसगढ़ में अब गुम हो रहा समाजवाद

By Mantralayanews :10-10-2018 07:53


रायपुर। छत्तीसगढ़ की धरती आंदोलनों की गवाह रही है। समाजवादी आंदोलन को यहां से मध्यभारत में विस्तार मिला। एक वक्त था जब समाजवादी यहां से विधानसभा और लोकसभा की कई सीटें जीतते थे। देश में आपातकाल के बाद बनी संविद सरकारों में भी समाजवादियों की हिस्सेदारी रही।

1954 में सीपी एंड बरार स्टेट को बांटकर जब नया मध्यप्रदेश बना तो जनसंघ के साथ मिलकर समावादियों ने विपक्षी मोर्चा बनाया। कांग्रेस के विरोध के आधार पर समाजवाद चलता रहा और इसी आधार पर जनसंघ और भाजपा भी उभरे।

जमानत भी नहीं बचा पा रहे समाजवादी

राममनोहर लोहिया छत्तीसगढ़ आए थे। उन्होंने यहां पार्टी को मजबूती दी। उनकी मृत्यु के बाद समाजवादी विचारधारा और गैर कांग्रेसवाद पर जनसंघ और बाद में भाजपा का कब्जा हो गया। जार्ज फर्नांडीस जैसे नेता भाजपा के सहयोगी हो गए। छत्तीसगढ़ में समाजवाद के अंतिम स्तंभ रहे पूर्व सांसद पुरूषोत्तम कौशिक तीन वर्ष पहले स्वर्गवासी हुए और उनके बाद यहां समाजवाद पूरी तरह खत्म हो गया।

अब हालत यह है कि समाजवादी विचारधारा की पार्टियां उत्तरप्रदेश और बिहार से आकर यहां चुनाव लड़ती हैं और किसी भी सीट पर जमानत भी नहीं बचा पाती हैं। इस बार भी समाजवादी पार्टी और जनता दल यूनाइटेड यहां से चुनाव लड़ने जा रहे हैं। इनकी चुनावी सफलता क्या होगी यह देखने की बात होगी।

समाजवाद का मजबूत गढ़

समाजवादी आंदोलन का छत्तीसगढ़ के इतिहास में बड़ा महत्व है। आजादी से पहले 1930 में नगरी-सिहावा के इलाके में जंगल सत्याग्रह शुरू हुआ। इस आंदोलन में महात्मा गांधी भी छत्तीसगढ़ आए थे। 1962 में बस्तर के राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की हत्या हो गई। इसके बाद राम मनोहर लोहिया यहां आए थे। वे महासमुंद गए थे। उनके अलावा लाडली मोहन निगम, मधु लिमये जैसे नेता भी यहां आते रहे।

वे सभी रायपुर में साधारण होटलों में रूकते और आंदोलन की रणनीति बनाते। आजादी के बाद एक बार फिर जंगल सत्याग्रह हुआ। इसके नेता थे समाजवादी सुखराम नागे। उनकी बाद में थाने के लॉकअप में मौत हो गई थी। लोहिया ने संसद में कहा था-हत्यारे का हाथ प्रवीर पर चल गया। सुखराम नागे पर चल गया। इस हाथ को रोको वर्ना यह किसी दिन प्रधानमंत्री पर भी चलेगा।

धमतरी और कुरूद इलाके में जयप्रकाश नारायण के काफी समर्थक थे। महासमुंद में पुरूषोत्तम कौशिक ऐसे नेता हुए जिन्होंने शुक्ल बंधुओं को हराया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा समाजवादी आंदोलन से उभरे थे। बाद में कांग्रेस में चले गए। कांग्रेस नेता रविंद्र चौबे के पिता भी समाजवादी थे।

रायपुर में ठाकुर प्यारेलाल सिंह, दुर्ग में बीवाई तामस्कर, भाजपा नेता महेश तिवारी सभी समाजवादी पृष्ठभूमि से निकले नेता थे। मध्यप्रदेश में समाजवादी बीवाई तामस्कर नेता प्रतिपक्ष रहे। समाजवादियों ने महासमुंद में कंडेल सत्याग्रह भी किया। किसानों के इस आंदोलन को काफी सफलता मिली और दुधावा बांध का पानी उन्हें मिलने लगा।

कई विधायक जीतते थे

60-70 के दशक में जब कांग्रेस विरोध चरम पर था तब समाजवादी ही इस विरोध के अगुवा थे। छत्तीसगढ़ में भी इसका असर था। समाजवादी कई सीटों पर चुनाव जीतते थे। 1952 में राजनांदगांव में जेएल फ्रांसिस विधायक थे। 1977 में यहां से मदन तिवारी जीते। इसके बाद दरबार सिंह ठाकुर जीतते रहे। संविद सरकार में मंत्री भी बने। रायपुर से पुरूषोत्तम कौशिक जीते। वे बाद में दुर्ग से भी जीते। महासमुंद से सांसद भी रहे। मंदिर हसौद से रामलाल चंद्राकर विधायक रहे। याकूब राजवानी महासमुंद से, माधव सिंह ध्रुव सिहावा से, धनीराम वर्मा कसडोल से, रामसेवक मिश्रा धमतरी से, वंशराज तिवारी बलौदाबाजार से चुनाव जीतते रहे।

जब इंदिरा की बुआ को सुनने उमड़ पड़ी थी जनता

राजधानी रायपुर के पुराने लोग आज भी उस सभा को नहीं भूलते जिसमें इंदिरा गांधी की बुआ आई थीं। पंडित विजयलक्ष्मी को सुनने के लिए इतनी जनता उमड़ी थी कि सप्रे शाला का मैदान छोटा पड़ गया था। यह आपात काल के दौर की बात है। समाजवादी आंदोलन जोरों पर था।

जानकार बताते हैं कि विजयलक्ष्मी इंदिरा के खिलाफ सभा करने आई थीं। उन्होंने मंच से इंदिरा के निर्णयों की जमकर आलोचना की। कहा-इंदिरा गलत कर रही हैं। विजयलक्ष्मी को उम्मीद थी कि अगर समाजवादी जीते तो वह प्रधानमंत्री पद की स्वाभाविक दावेदार होंगी। हालांकि ऐसा हो न सका लेकिन रायपुर की उनकी सभा इतिहास में दर्ज हो गई।
 

Source:Agency