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कुम्भ की सार्थकता बनाम राजनीतिक उपयोग

By Mantralayanews :11-02-2019 08:28


भारतीय राजनीति में धर्म का प्रमुख साधन के रूप में उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी तो उसका कारण यह था कि लोकतंत्र की प्रतिष्ठा के बाद की नई राजनीति में धर्म, पूजा पद्धतियों तथा उनसे जन्मी साम्प्रदायिकता को बड़ा महत्व नहीं मिल पाया था। आजादी के बाद लोकतांत्रिक संविधान बनाकर 1952 में लोकसभा चुनाव के प्रयोग से पहले देश केे बंटवारे को लेकर भारी खून-खराबा हो चुका था। लेकिन हिन्दू महासभा, भारतीय जनसंघ व रामराज्य परिषद के गठन तथा अखण्ड भारत का नारा दिये जाने के बावजूद उक्त चुनाव में उनको कुल मिलाकर दस लोकसभा सीटें भी नहीं मिल पायी थीं यानी देश की तत्कालीन जनता या कि मतदाताओं ने उन्हें कतई महत्व नहीं दिया था और उसकी प्राथमिकताओं में वे बहुत नीचे रह गये थे। 

लोकसभा के चुनावी वर्ष में उत्तर प्रदेश में प्रयागराज के अर्धकुम्भ को महाकुम्भ के रूप में प्रचारित करने और उसकी व्यवस्था पर भारी खर्च में पुरानी सारी सीमाओं का अतिक्रमण करने के वास्तविक निहितार्थों के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के लिए कुम्भ की स्वीकार्यता के साथ जनजीवन पर पड़ने वाले उसके प्रभावों की सीमाओं का मूल्यांकन तो करना ही होगा, इस बाबत भी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट रखना होगा कि मूल्यांकन में कुम्भ के प्रभाव को एकाकी रूप में देखा जाये या उसका लाभ उठाना चाहने वालों की रणनीति के स्वरूप व अंग की दृष्टि से? उसे धार्मिकता का बढ़ता हुआ प्रभाव माना जाये, तो उसे अयोध्या तथा उसके जैसे अन्य आन्दोलनों व उनकी सफलताओं से जोड़ना और इस सवाल का जवाब भी ढूढ़ना होगा कि उसकी व्यापकता का विस्तार होगा तो वह सरकार के प्रयत्नों व प्राथमिकताओं में किस प्रकार शामिल होगा या उन्हें कैसे प्रभावित करेगा?    

कुम्भ मेले की बाबत कहा जाता है कि यह सम्राट हर्षवर्धन के समय बारह वर्षों में एक बार होने वाला आयोजन था और उसका लक्ष्य उन सभी संस्कारिक गतिविधियों पर सामूहिक रूप से विचार-विमर्श था, जिनसे जनता प्रभावित होती है। प्रसंगवश, सम्राट हर्षवर्धन का काल 8वीं शताब्दी माना जाता है, जबकि मुहम्मद साहब का प्रादुर्भाव सातवीं शताब्दी में ही हो गया था और उनके प्रयत्नों के फलस्वरूप धर्म को संस्थात्मक रूप भी मिलने लगा था। यों, धर्म के संस्थात्मक स्वरूप का पहले-पहल उदय बौद्धकाल में हुआ माना जाता है, जिसके बाद ईसाई  एवं इस्लाम धर्म आये और उन्होंने उसको भरपूर संस्थात्मक स्वरूप प्रदान किया। 

इससे पहले के जिन प्रमुख प्रमुख विचारकों के नाम आते हैं, वे जागतिक प्रभावों से अलग होकर जंगलों में रहते थे और सम्पर्क साधनों के अभाव में उनके विचार सीमित ही रह जाते थे। हम जानते हैं कि तब जनसंचार 'बतकही' तक ही सीमित था और उसका विस्तार नहीं हुआ था। आवागमन के साधन भी अपर्याप्त ही थे। इस काम के लिए प्रमुख रूप से जल परिवहन ही प्रयुक्त होता था। इस लिहाज से कुम्भ के लिए प्रयाग व उज्जैन जैसे नगरों का नदियों के किनारे अवस्थित होना सुविधाजनक था। आठवीं सदी में शंकराचार्य की चार पीठों तथा अखाड़ों का निर्माण भी इसी दृष्टि से हुआ, जो कुम्भ से जुड़े। अलबत्ता, आज के युग संदर्भ में समझने की एक बड़ी बात यह भी है कि 12 वर्षों में एक बार महाकुम्भ और 6 वर्षों में अर्धकुम्भ की परम्परा बनी या डाली गई, तो प्रयाग कोई अतिविकसित क्षेत्र नहीं था। 

भारतीय राजनीति में धर्म का प्रमुख साधन के रूप में उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी तो उसका कारण यह था कि लोकतंत्र की प्रतिष्ठा के बाद की नई राजनीति में धर्म, पूजा पद्धतियों तथा उनसे जन्मी साम्प्रदायिकता को बड़ा महत्व नहीं मिल पाया था। आजादी के बाद लोकतांत्रिक संविधान बनाकर 1952 में लोकसभा चुनाव के प्रयोग से पहले देश केे बंटवारे को लेकर भारी खून-खराबा हो चुका था। लेकिन हिन्दू महासभा, भारतीय जनसंघ व रामराज्य परिषद के गठन तथा अखण्ड भारत का नारा दिये जाने के बावजूद उक्त चुनाव में उनको कुल मिलाकर दस लोकसभा सीटें भी नहीं मिल पायी थीं यानी देश की तत्कालीन जनता या कि मतदाताओं ने उन्हें कतई महत्व नहीं दिया था और उसकी प्राथमिकताओं में वे बहुत नीचे रह गये थे। 

1950 में हिन्दू कोड बिल लाकर उसे कानून में बदलने का प्रयत्न आरम्भ हुआ तो बड़े पैमाने पर साधु-संत और उनके धार्मिक या राजनीतिक संगठन व्यक्ति के धार्मिक स्वरूप और मान्यता में दखल बताकर उसका विरोध कर रहे थे। लेकिन साम्प्रदायिक दलों को इसका  भी बड़ा लाभ नहीं मिल पाया। किसानों के लिए भूमि कानूनों में परिवर्तन कर जमींदारी विनाश कानून बनाया गया ओर किसानों को भूमिधरी का अधिकार दिया गया तो भी सामन्ती व्यवस्था इसकी विरोधी थी, लेकिन उसका विरोध उक्त कानून लागू करने वालों की लोकप्रियता घटा नहीं पाया था। उलटे उसका विस्तार ही हुआ था। 

इस सवाल पर लौटें कि अर्धकुम्भ को कुम्भ प्रचारित कराकर उसका उपयोग साम्प्रदायिकता वृद्धि के लिए तो नहीं किया जा रहा है, तो जवाब के लिए इस तथ्य से भी गुजरना होगा कि देश की लोकतांत्रिक राजनीति के संचालन में निर्णायक भूमिका निभा रहे जनप्रतिनिधित्व कानून में साम्प्रदायिकता को अस्वीकार्य और अग्राह्य ही नहीं, बल्कि दोष भी माना गया था। लेकिन समाज में आवागमन व संचार के साधनों के विकास के साथ ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की बढ़ती जानकारियां जनअपेक्षाओं में प्रचलित विभिन्न कार्यक्रमों में बदलाव को भी प्रेरित कर रही थीं। इन्हीं प्रेरणाओं के कारण भारतीय जनसंघ भारतीय जनता पार्टी के रूप में परिवर्तित हुआ और तत्कालीन गैरकांग्रेसवाद के आन्दोलन में उसे सबसे अधिक महत्व मिला। बताने की बात नहीं कि गांधीवादी समाजवाद की राह पर चलकर दो लोकसभा सीटों पर सिमटने के बाद भाजपा साम्प्रदायिकता का लाभ उठाने को आतुर हो उठी और धर्म के राजनीतिक उपयोग के लिए उसने खुद को 1983 में अयोध्या मामले सें भी जोड़ लिया। फिर उसने उसे अपने कार्यक्रमों में भी शामिल करना शुरू कर दिया। 

इसके फ लस्वरूप उसे अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बैनर और घटक दलों के समर्थन के बल पर देश की सत्ता में आने का अवसर भी मिला। अलबत्ता, उससे मोहभंग के बाद दस साल तक कांग्रेस के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने मनमोहन सिंह के नेत्त्व में देश की सत्ता संभाली, जिसके बदनाम हो जाने के बाद 2014 में भाजपा को नरेन्द्र मोदी के 'महानायकत्व' की बिना पर अकेली अपने बूते पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का मौका मिला। तब उसने नये रंग-ढंग में खुद को नये सामाजिक, आर्थिक कार्यक्रमों के साथ जोड़ना भी आरंभ किया। लेकिन अब जब नरेन्द्र मोदी के जादू का असर घट रहा है और भाजपा 2019 के अंदेशों से परेशान है, उसने अपने पितृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परामर्श के बाद अयोध्या मामले को अपनी राजनीतिक रणनीति में फिर से स्थान दिया है। भले ही इस मामले के बारे में एक दृष्टिकोण यह भी है कि यह मुद्दा 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से ही अपना प्रभाव खोने लगा था। 

भाजपा की नई रणनीति का प्रभाव उसके विभिन्न कार्यक्रमों यहां तक कि बजट में भी देखा जा सकता है। कोई संदेह नहीं कि साम्प्रदायिक विभाजन को लाभकारी दृष्टि से देखने वाली उसकी नीयत ने कुम्भ मेले को भी अपनी जद में रखा है। यकीनन, उसके लिए कुम्भ का इस्तेमाल उसे अयोध्या मामले से काटकर देखने में नहीं, जोड़ने में सहायक के रूप में ही है। इसी दृष्टि से राममंदिर निर्माण को लेकर न्यायालय की सर्वोच्चता तथा निर्णय की स्वीकार्यता के राग अलापने के साथ मंदिर निर्माण के लिए तात्कालिक प्रयत्न को भी महत्व दिया गया। 

लेकिन उसका दुर्भाग्य कि धर्म की विसंगतियों के कारण विभिन्न आस्थाओं एवं विश्वासों को जोड़ना आसान नहीं होता। इसीलिए जिस अर्धकुम्भ को कुम्भ बनाकर उसने अपने चुनावी लाभ से जोड़ना चाहा  था, उसमें विश्व हिन्दू परिषद द्वारा प्रायोजित धर्म संसद में हंगामे के बाद उसको लोकसभा चुनाव तक राममन्दिर निर्माण के लिए किसी भी आन्दोलन से विरत रहने का निर्णय करना पड़ा है। निस्संदेह, इससे देश पर फिर से सत्तासीन होने का सपना देख रही भाजपा की कठिनाइयां बढ़ने वाली ही हैं।
 

Source:Agency