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लोकसभा चुनाव : मायावती की एक आवाज पर क्यों गोलबंद हो जाते हैं दलित?

By Mantralayanews :14-03-2019 07:45


उत्तर प्रदेश में दलितों के वोट हासिल करने के लिए बिसात बिछनी शुरू हो गई है. पश्चिमी यूपी में दलितों के बीच उभर रहे एक नए चेहरे भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर से जैसे ही कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने मुलाकात की सियासी पारा चढ़ गया. इसके कुछ ही घंटे बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने मायावती से मुलाकात की. सियासी जानकारों का कहना है कि चंद्रशेखर का उभार मायावती को नुकसान पहुंचा सकता है. इसीलिए मायावती कभी चंद्रशेखर को तवज्जो नहीं देती हैं.  हालांकि अभी वो इलेक्टोरल पॉलिटिक्स में नहीं हैं. सियासी जानकारों का कहना है कि कांग्रेस चंद्रशेखर के सहारे दलितों को अपनी तरफ करने की कोशिश में जुटी हुई है, जो कभी उसका कोर वोटबैंक हुआ करता था. सवाल ये है कि क्या यूपी में दलितों को रिझाने की ये कांग्रेस रणनीति सफल हो पाएगी?

मायावती पर 'बहनजी: द राइज एंड फॉल ऑफ मायावती' नामक किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस कहते हैं "गैर जाटव दलितों में मायावती के खिलाफ नाराजगी है. चंद्रशेखर जैसे कुछ जाटव नेताओं का उभार तो हो रहा है. फिर भी यूपी में दलितों के पास मायावती के अलावा कोई और चारा नहीं है. कोई इतना बड़ा नाम नहीं है."
सवाल ये है कि वो कौन सी ताकत है जिससे मायावती की एक आवाज पर दलित गोलबंद हो जाते हैं. वो कौन सा जादू है कि ज्यादातर दलित वोटर हर हाल में मायावती के साथ रहता है? क्या सिर्फ मायावती का ही दलित वोटों पर एकाधिकार है या फिर कोई और ऐसा नहीं है जिस पर दलित भरोसा कर पाएं. मायावती के सियासी तिलिस्म के अगले एपिसोड में क्या होने वाला है, इसका सबको इंतजार है.

राजनीतिक विश्लेषक अंबरीश त्‍यागी कहते हैं "मायावती का ज्यादातर वोटर गरीब और दबा-कुचला वर्ग है. इस वर्ग की यूनिटी अलग सी होती है. उसका सबसे अहम सरोकार सम्मान से जुड़ा होता है. इसे बचाने के लिए जो नेता खड़ा होता है उसे वह दिल से समर्थन करता है. मायावती चार बार मुख्यमंत्री रही हैं. जाहिर है उन्होंने अपने शासनकाल में दलितों के उत्कर्ष के लिए कुछ काम किए होंगे."

Source:Agency