'या अल्लाह! रसगुल्ला! धर्म का अपमान नहीं', हाई कोर्ट से भारती सिंह और शेखर सुमन को बड़ी राहत, FIR रद्द
Updated on
01-05-2026 12:48 PM
बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार को कमीडियन भारती सिंह और एक्टर शेखर सुमन को बड़ी राहत देते हुए साल 2010 में दर्ज एफआईआर को रद्द करने का आदेश दिया है। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ये स्पष्ट किया कि हास्य-व्यंग्य और तुकबंदी के उद्देश्य से किए गए कॉमेंट का का लक्ष्य किसी समुदाय की भावनाओं को आहत करना नहीं होता।
बुधवार को मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट की तरफ से कहा गया कि जिन शब्दों को आपत्तिजनक बताया जा रहा है (या अल्लाह! रसगुल्ला! दही भल्ला!) उन्हें लेकर याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये केवल तुकबंदी और हास्य के लिए इस्तेमाल किए गए शब्द हैं।
कोर्ट ने भारती सिंह और शेखर सुमन की दलील पर जताई सहमति
कोर्ट की तरफ से कहा गया कि याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 'दही भल्ला' और 'रसगुल्ला' आम खाद्य पदार्थ हैं, जो सभी समुदायों के लोग खाते हैं। इन अभिव्यक्तियों में कोई धार्मिक रंग नहीं है और इस तर्क को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सामान्य सामाजिक उपयोग में ये शब्द अपने आप में न्यूट्रल हैं। किसी हास्यपूर्ण कार्य में खाद्य पदार्थों का मात्र उल्लेख धर्म का अपमान नहीं हो सकता। यह साबित करने के लिए सबूत होने चाहिए कि इन शब्दों को अपमान के हथियार के रूप में चुना गया था।
कहा- ऐसे कार्यक्रमों में कलाकारों और जजों का उद्देश्य हंसी पैदा करना
कोर्ट ने यह भी माना कि कलाकारों को टारगेट करना आसान हो गया है, क्योंकि उन तक पहुंच बहुत आसान है लेकिन आपराधिक कानून का इस्तेमाल गलत तरीके से करना भी गलत है। उन्होंने आगे कहा कि शो पारिवारिक मनोरंजन कार्यक्रम के रूप में प्रसारित होता था और काफी समय से चल रहा था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसे कार्यक्रमों में कलाकारों और जजों का उद्देश्य हंसी पैदा करना होता है।
'कोर्ट उस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकता जिसमें ठोस आधार का अभाव हो'
कोर्ट के मुताबिक, 'वर्तमान परिस्थितियां मामले के रद्द करने वाली लग रही हैं। मंच पर प्रदर्शन करने वाला कलाकार अक्सर निर्धारित स्क्रिप्ट के हिसाब से ही एक्टिंग करता है। उपलब्ध सबूतों से यह स्पष्ट नहीं होता कि याचिकाकर्ता जजों ने उन डायलॉग को लिखा था। उनकी भूमिका इतनी सीमित है कि उन पर लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया में सिद्ध नहीं होते। कोर्ट प्रोसेक्यूशन के उस व्यापक तर्क को स्वीकार नहीं कर सकता जिसमें ठोस आधार का अभाव हो। जब शिकायत में आवश्यक तथ्यों का अभाव हो और अपराध की पुष्टि न होती हो तो ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।'
कार्यवाही को रद्द और निरस्त किया गया
कोर्ट ने मामले को रद्द करने वाले अपने आदेश में कहा, 'भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए के साथ धारा 34 के तहत दंडनीय अपराध के लिए पायधोनी पुलिस स्टेशन में दिनांक 27 नवंबर 2010 को दर्ज की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट और उससे उत्पन्न सभी परिणामी कार्यवाही को रद्द और निरस्त किया जाता है।'
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